मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

पॉलिटिक्स, पार्टी, पाला, पल्ला

पॉलिटिक्स में 'प' शब्द की बहुत अहमियत है. पॉलिटिक्स है तो पार्टिया होंगी. पक्ष-प्रतिपक्ष होगा, प्रतिद्वंद्विता होगी. पॉलिटिक्स होगी, पार्टियां होंगी, पक्ष-प्रतिपक्ष होगा, प्रतिद्वंद्विता होगी तो पॉलिटीशियन भी होंगे. पॉलिटीशियन हैं तो पॉवर चाहिए. पॉवर चाहिए तो पाला भी बदलना पड़ सकता है. प्राफिट मिले तो पाला बदलने में कोई बुराई नहीं है. पॉलिटिक्स में किसी एक के साथ प्रतिबद्धता का वैसे भी कोई मतलब नहीं. वह जमाना गया, जब किसी और के पहलू में बैठ जाने का लोग बुरा मानते थे. अब तो यह इतना आम हो गया है कि इस पर कोई ध्यान ही नहीं देता. आज के दौर की बात करें तो पॉलिटिक्स में पल्ला झाडऩे की परिपाटी चल पड़ी है.

पॉलिटिक्स की इस परिपाटी यानी पल्ला झाडऩे की ही बात करते हैं. पॉलिटिशीयन्स को जब लगता है कि उनकी प्रामिनेंस कम हो रही है, तो वे कोई ऐसा बयान दे देते हैं, जिससे पॉलिटिकल 'स्टार्म' जैसी नौबत आ जाती है. फायदा मिल रहा हो, वोट बैंक में इजाफा हो रहा हो, तो कोई बात नहीं. बवाल बढ़े, पोजीशन ऑकवर्ड होती हो तो पार्टियां यह कहकर पल्ला झाड़ लेती हैं, कि यह फलां नेता का पर्सनल बयान है.पार्टी का इससे कोई लेना-देना नहीं...more

2 टिप्‍पणियां:

  1. आज तक अलंकर का इतना सुन्दर समन्वय पद्य में ही देखने और पढने को मिला है. गद्य में पहली बार सामने आया है. कम शब्दों में आज के दौर की पालिटिक्स को पल में समझाने के लिए इससे अच्छी पंक्तियाँ किसी ने नहीं लिखी. अपना ब्लॉग शुरू करने के लिए आपको ढेर सारी बधाइयाँ.
    राहुल श्रीवास्तव.

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  2. पॉलिटिक्स के इस पाले में एक प का जिक्र छूट गया पत्रकार... वो भी बड़ी तेजी से इस पचड़े में फंसता जा रहा है।

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