गोरखपुर -वाराणसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर कौड़ीराम बाज़ार में सटे गोड़सरी गाँव के बीचों-बीच एक पुराना पीपल का पेड़ था—जिसकी जड़ों में जैसे पूरे गांव की यादें सिमटी हुई थीं। उसी के पास खड़ा रहता था सुरेन्दर। दूर से देखने पर वह सचमुच बिजूका लगता—सीधा, चुपचाप, बिना हरकत के। पर भीतर, वह एक पूरा इंसान था—भावनाओं, यादों और अधूरे संवादों से भरा हुआ।
सुरेन्दर कभी अपने गांव की धड़कन हुआ करता था। तब उसकी हंसी में अपनापन होता था और उसकी बातों में भरोसा। जब वह बच्चों को पढ़ाता, तो सिर्फ अक्षर नहीं सिखाता था—वह उनके सपनों को आकार देता था। उसकी पत्नी बिमला अक्सर मुस्कराकर कहती—
“तुम लोगों को सिर्फ रास्ता नहीं दिखाते, उनमें चलने की हिम्मत भी भरते हो।”
लेकिन पिछले साल बीमारी की वजह से बिमला असमय अनंतलोक की अंतहीन यात्रा पर निकल गई थी।
उसके जाने के बाद सुरेन्दर के भीतर जैसे कुछ हमेशा के लिए से टूट गया था। पहले जो आदमी दूसरों के दुख में ढाल बनकर खड़ा रहता, अब अपने ही दुख के सामने असहाय हो गया। नतीजा, पहले लोगों से बोलना कम हुआ, फिर धीरे धीरे-धीरे बातचीत लगभग बंद ही हो गई। गाँव वालों ने इसे “अहंकार” या “पुरानी सोच” का नाम दिया, जबकि सच यह था कि वह अपने भीतर की खाली जगह को समझने की कोशिश कर रहा था।
समय के साथ नए लोग आए—तेज़, प्रैक्टिकल, और कहीं न कहीं संवेदनहीन। उन्होंने सुरेन्दर की चुप्पी को कमजोरी समझ लिया। पंचायत में उसकी जगह नए चेहरों ने ले ली। बच्चों ने अब उससे पढ़ना छोड़ दिया। जो लोग कभी उसके पास सलाह लेने आते थे, अब उसे देखकर रास्ता बदल लेते।
धीरे-धीरे सुरेन्दर एक आदत बन गया—जैसे खेत में खड़ा बिजूका, जो दिखता तो है, पर जिसके होने या न होने से किसी को फर्क नहीं पड़ता।
पर सच्चाई यह थी कि सुरेन्दर हर रोज़ उस पीपल के नीचे खड़े होकर अपने अतीत से मिलता था।
वह वहीं खड़ा होकर उन बच्चों की आवाज़ें सुनता, जो कभी उससे ‘अ’ से ‘अनार’ और ‘ क’ से ‘कमल’ सीखते थे। उसे बिमला की हंसी सुनाई देती, जब वह उसे चाय के लिए बुलाती थी। उसकी आंखें कभी-कभी भर आतीं, पर आंसू बाहर नहीं आते—जैसे उसने अपने दर्द को भी खामोश रहना सिखा दिया हो।
एक दिन, जब गांव में जमीन को लेकर बड़ा विवाद हुआ, तो वही लोग जो उसे नजरअंदाज करते थे, अचानक उसे याद करने लगे।
“सुरेन्दर समझदार है… उससे पूछो,” किसी ने कहा।
भीड़ में हलचल हुई। कुछ चेहरों पर झिझक थी, कुछ पर अपराधबोध दिख रहा था। सुरेन्दर ने यह सब देखा, पर उसके चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं थी। बिल्कुल सपाट।
वह धीरे-धीरे आगे आया।
उसने दोनों पक्षों की बातें सुनीं—सिर्फ शब्द नहीं, उनके पीछे छिपे डर, लालच और असुरक्षा को भी महसूस किया। फिर उसने बहुत शांति से कहा—
“जमीन सिर्फ मिट्टी नहीं होती… यह रिश्तों की जड़ भी होती है। अगर जड़ ही कट गई, तो पेड़ बचा भी तो सूखा रहेगा।”
उसकी आवाज़ में कोई तर्क नहीं था, बस अनुभव था। और शायद वही बात सबको छू गई।
झगड़ा खत्म हो गया। लोग धीरे-धीरे लौटने लगे। कुछ ने उसकी तरफ देखा, जैसे पहली बार उसे सच में देख रहे हों।
पर सुरेन्दर फिर उसी पीपल के नीचे जाकर खड़ा हो गया।
क्योंकि इंसान को सिर्फ एक बार याद कर लेने से उसकी जगह वापस नहीं मिलती।
उस रात गाँव के एक छोटे-से लड़के, सोहन, ने अपनी मां से पूछा—
“माँ, सुरेन्दर काका हमेशा वहाँ क्यों खड़े रहते हैं?”
माँ कुछ पल चुप रही, फिर बोली—
“बेटा, कुछ लोग तब भी खड़े रहते हैं जब कोई उनके साथ नहीं खड़ा होता… ताकि अगर किसी को कभी जरूरत पड़े, तो वह उन्हें वहीं मिलें।”
अगले दिन, सोहन चुपचाप सुरेन्दर के पास गया और उसके बगल में खड़ा हो गया।
काफी दिनों के बाद सुरेन्दर के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान नजर आई।
शायद वह अब भी बिजूका था…
पर उसके भीतर का इंसान पूरी तरह मरा नहीं था।
