गुरुवार, 3 सितंबर 2026

दरार

घड़ी की सुइयाँ रात के ग्यारह बजा रही थीं।

जनवरी की ठिठुरती रात में दिल्ली पर कोहरे की चादर धीरे-धीरे गहरी होती जा रही थी। डिफेंस कॉलोनी की शांत सड़क पर स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी भी धुंध में कहीं खो गई थी।

कोठी नंबर Z-9984 की पहली मंज़िल पर सिया अपने कमरे में जाने से पहले अगले दिन की कुछ जरूरी चीजें समेट रही थी। डिनर के बाद वह सोने चली गई थी, लेकिन अंकित अभी नीचे लॉबी में था।

रेलिंग के सहारे खड़ा होकर वह बेहद धीमी आवाज़ में किसी से बात कर रहा था।

सिया ने दरवाज़े तक जाकर एक पल के लिए नीचे देखा।

वह आवाज़ पहचानती थी।

यह ऑफिस कॉल नहीं थी।

पिछले कुछ महीनों से यह लगभग रोज़ का सिलसिला बन चुका था। देर रात की फोन कॉल, अचानक मुस्कान, स्क्रीन पर किसी संदेश के आते ही चेहरे पर उतर आने वाली चमक और उसके सवालों के जवाब में एक अजीब-सी झुंझलाहट।

सिया कुछ देर वहीं खड़ी रही।

फिर उसने गौर किया—अंकित जिस नरमी से फोन पर बात कर रहा था, आवाज़ में वही गर्माहट थी जो कभी उसके लिए हुआ करती थी।

कभी।

वह वापस कमरे में आ गई।

कुछ नहीं पूछा।

कुछ नहीं कहा।

बस चुप रही।

शादी को सात साल हो चुके थे।

कभी यह घर आवाज़ों से भरा रहता था—सिया की हंसी, अंकित की ऊंची आवाज़ में सुनाई जाने वाली कहानियां, छोटी-छोटी बातों पर होने वाली नोकझोंक और उनकी बेटी अनुष्का की खिलखिलाहट।

अब घर में सामान वही था, कमरे वही थे, दिनचर्या वही थी।

बस बातों की खनक कम हो गई थी।

और सन्नाटा बढ़ गया था।

रिश्ते अक्सर किसी एक बड़े हादसे से नहीं टूटते। वे छोटी-छोटी अनदेखी दरारों से कमजोर होते हैं।

एक अधूरा संवाद।

एक टला हुआ सवाल।

एक शिकायत जिसे कहने का सही समय कभी नहीं मिला।

एक माफी जो मांगी नहीं गई।

और धीरे-धीरे दो लोग एक ही घर में रहते हुए भी एक-दूसरे से दूर होते चले जाते हैं।

सिया और अंकित के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।

फिर दीपा आई।

ऑफिस की कलीग।

पहले सामान्य बातचीत हुई। फिर काम के बहाने लंबी बातचीत। उसके बाद पर्सनल बातें । अंकित को लगा कि दीपा उसे समझती है—उसकी परेशानियां, उसकी नाराज़गी, उसकी ख़ामोशियाँ।

और शायद सबसे ज्यादा यह कि वह उसे सुनती है।

वह जगह, जो कभी सिया और अंकित के बीच हुआ करती थी, धीरे-धीरे खाली होती गई।

और उस खाली जगह में दीपा आ गई।

सिया को शक था।

लेकिन शक और सच के बीच एक लंबी खामोशी होती है।

वह उस खामोशी में जीती रही।

कभी खुद को समझाती, कभी अंकित को समझने की कोशिश करती।

शायद वह ज्यादा व्यस्त है।

शायद ऑफिस का तनाव है।

शायद मैं ही ज्यादा सोच रही हूं।

शायद सब ठीक हो जाएगा।

लेकिन एक रात उसने खुद को और झूठ बोलने से मना कर दिया।

“दीपा कौन है?”

अंकित कुछ क्षण उसे देखता रहा।

“कोई नहीं।”

“तो रात के ग्यारह बजे उससे इतनी धीमी आवाज़ में बात क्यों करते हो?”

“ऑफिस की बात है।”

“हर रात?”

अंकित चुप हो गया।

सिया ने पहली बार उसकी आंखों में देखा।

“मुझसे झूठ मत बोलो, अंकित।”

लंबी चुप्पी के बाद अंकित ने नज़रें झुका लीं।

“हां।”

बस एक शब्द।

लेकिन उस एक शब्द ने सात साल की शादी के भीतर जैसे एक साथ कई दरवाज़े बंद कर दिए।

कुछ देर बाद उसने कहा—

“मुझे उसके साथ अच्छा लगता है।”

सिया के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया।

अंकित ने आगे कहा—

“कम से कम वो मुझे सुनती तो है।”

सिया ने धीमे से पूछा—

“और मैं?”

अंकित के पास कोई जवाब नहीं था।

शायद इसलिए नहीं कि जवाब नहीं था।

बल्कि इसलिए कि जवाब बहुत देर से मिला था।

उस रात के बाद घर बदल गया।

बातचीत सवालों में बदल गई।

सवाल आरोपों में।

आरोप तानों में।

और ताने धीरे-धीरे चुप्पी में।

सिया ने तलाक की बात कही।

इस बार अंकित घबरा गया।

उसे अचानक सब कुछ दिखाई देने लगा—अनुष्का, परिवार, समाज, रिश्तेदार, सात साल की शादी और वह घर जिसे उसने हमेशा अपना सुरक्षित संसार समझा था।

वह सिया को खोना नहीं चाहता था।

लेकिन शायद यह भी नहीं समझ पा रहा था कि उसे बचाने के लिए सबसे पहले क्या करना होगा।

एक रात बहस इतनी बढ़ गई कि गुस्से में अंकित का हाथ उठने को हुआ।

सिया पीछे हट गई।

अंकित का हाथ हवा में ही रुक गया।

दोनों कुछ क्षण एक-दूसरे को देखते रहे।

उस एक क्षण में सिया ने फैसला कर लिया।

उसने अनुष्का को उठाया, कुछ कपड़े एक छोटे बैग में डाले और घर से निकल गई।

बाहर जनवरी की ठंडी हवा थी।

लेकिन उस रात सिया को ठंड महसूस नहीं हुई।

उसे सिर्फ इतना महसूस हो रहा था कि अगर वह एक रात और उसी घर में रही, तो शायद खुद से नज़रें नहीं मिला पाएगी।

अगली सुबह वह अपनी बहन के साथ क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. आहूजा के पास गई।

पहली मुलाकात में वह बहुत कम बोली।

फिर अचानक रो पड़ी।

काफी देर तक।

जैसे आँसू नहीं, महीनों से जमा शब्द बाहर निकल रहे हों।

धीरे-धीरे उसने बोलना शुरू किया।

उसे एहसास हुआ कि कहानी सिर्फ अंकित और दीपा की नहीं थी।

कहीं न कहीं यह उसकी अपनी भी कहानी थी।

उन बातों की, जिन्हें उसने समय रहते कहा नहीं।

उन नाराज़गियों की, जिन्हें उसने छोटी समझकर टाल दिया।

उस अकेलेपन की, जिसे उसने पत्नी, माँ और घर की जिम्मेदारियों के बीच पहचानने की कोशिश ही नहीं की।

काउंसलिंग ने उसके भीतर एक कठिन सवाल खड़ा किया—

क्या किसी रिश्ते में सिर्फ विश्वासघात ही दोषी होता है?

या उससे पहले पैदा हुई वह खामोशी भी, जिसे दोनों ने मिलकर अनदेखा किया था?

छह महीने बाद उनका तलाक हो गया।

किसी की जीत नहीं हुई।

किसी की हार भी नहीं।

बस एक रिश्ता खत्म हो गया।

लीगल पेपर्स पर दो हस्ताक्षर हुए और सात साल की साझी जिंदगी दो अलग-अलग रास्तों में बंट गई।

अंकित ने भी धीरे-धीरे खुद को देखने की कोशिश शुरू की।

उसे समझ आने लगा था कि सिया को खोने से पहले वह खुद अपने भीतर से बहुत कुछ खो चुका था।

उसने काउंसलिंग शुरू की।

दीपा भी उसकी जिंदगी में ज्यादा दिन नहीं रही।

लेकिन इस बार अंकित ने किसी और को दोष नहीं दिया।

उसने अपनी बेटी अनुष्का के साथ रिश्ता बचाने की कोशिश शुरू की।

पहले अनुष्का उससे कम बात करती थी।

फिर थोड़ी ज्यादा।

कभी वीडियो कॉल।

कभी स्कूल का कार्यक्रम।

कभी आइसक्रीम।

छोटी-छोटी मुलाकातों से पिता और बेटी के बीच एक नया पुल बनने लगा।

उधर सिया ने फिर नौकरी शुरू कर दी।

एक छोटा-सा घर लिया।

घर छोटा था, लेकिन उसमें एक चीज बड़ी थी—शांति।

वहाँ किसी के देर से आने की प्रतीक्षा नहीं थी।

किसी फोन कॉल का डर नहीं था।

किसी सवाल का अधूरा जवाब नहीं था।

और धीरे-धीरे सिया ने जाना कि अकेलापन और अकेले रहना एक ही बात नहीं है।

समय गुजरता गया।

लगभग दो साल बाद अनुष्का के स्कूल में एक कार्यक्रम था।

पैरेंट्स के लिए भी इंविटेशन था।

सिया एक तरफ बैठी थी।

अंकित दूसरी तरफ।

दोनों के बीच कई कुर्सियों का फासला था।

कार्यक्रम के दौरान बच्चों से उनके परिवार के बारे में कुछ कहने को कहा गया।

अनुष्का स्टेज पर गई।

माइक उसके हाथ में था।

उसने कुछ पल सोचा और फिर कहा—

“मेरे मम्मी-पापा साथ नहीं रहते। लेकिन दोनों मुझे बहुत प्यार करते हैं।”

सिया की आंखें भर आईं।

अंकित ने सिर झुका लिया।

एक बच्चे के लिए यह शायद एक साधारण-सा वाक्य था।

लेकिन उन दोनों के लिए उसमें पूरी एक जिंदगी थी।

कार्यक्रम खत्म हुआ।

लोग धीरे-धीरे बाहर निकलने लगे।

सिया और अंकित की नज़रें पहली बार बिना किसी गुस्से के मिलीं।

न शिकायत।

न आरोप।

न सफाई।

बस एक शांत-सी स्वीकृति।

जैसे दोनों ने पहली बार अपनी कहानी को बाहर से देखा हो।

अंकित धीरे से उसके पास आया।

कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—

“काश, हम पहले समझ गए होते।”

सिया ने हल्की-सी मुस्कान के साथ उसकी ओर देखा।

“शायद तब हम समझ ही नहीं पाते।”

अंकित ने उसकी बात सुनी।

इस बार बिना किसी बचाव के।

सिया ने कुछ क्षण बाद कहा—

“दरारें हमेशा दीवार गिराने के लिए नहीं आतीं, अंकित। कभी-कभी वे सिर्फ यह बताने आती हैं कि बुनियाद कहां कमजोर हो रही है।”

अंकित ने धीरे से सिर हिला दिया।

दोनों कुछ देर वहीं खड़े रहे।

फिर अपनी-अपनी दिशा में चल पड़े।

वे साथ नहीं लौटे।

और शायद लौटना जरूरी भी नहीं था।

कुछ रिश्ते साथ रहकर नहीं, सम्मान के साथ दूर होकर पूरे होते हैं।

कुछ दरारें कभी भरती नहीं।

समय बस उनकी गहराई कम कर देता है।

लेकिन अगर उन्हें समय रहते पढ़ लिया जाए, तो वे टूटने की खबर नहीं होतीं—चेतावनी होती हैं।

क्योंकि रिश्ते अक्सर तब नहीं टूटते जब कोई तीसरा व्यक्ति उनके बीच आता है।

वे उससे बहुत पहले टूटना शुरू हो जाते हैं—

जब दो लोग एक-दूसरे के सामने होते हुए भी एक-दूसरे से बात करना बंद कर देते हैं।

और शायद हर रिश्ते को बचाने के लिए सबसे पहले किसी बड़ी गलती को नहीं,

उस छोटी-सी चुप्पी को पहचानना जरूरी है, जहां पहली दरार जन्म लेती है।


बुधवार, 12 अगस्त 2026

बिजूका



गोरखपुर -वाराणसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर कौड़ीराम बाज़ार में सटे गोड़सरी गाँव के बीचों-बीच एक पुराना पीपल का पेड़ था—जिसकी जड़ों में जैसे पूरे गांव की यादें सिमटी हुई थीं। उसी के पास खड़ा रहता था सुरेन्दर। दूर से देखने पर वह सचमुच बिजूका लगता—सीधा, चुपचाप, बिना हरकत के। पर भीतर, वह एक पूरा इंसान था—भावनाओं, यादों और अधूरे संवादों से भरा हुआ।


सुरेन्दर कभी अपने गांव की धड़कन हुआ करता था। तब उसकी हंसी में अपनापन होता था और उसकी बातों में भरोसा। जब वह बच्चों को पढ़ाता, तो सिर्फ अक्षर नहीं सिखाता था—वह उनके सपनों को आकार देता था। उसकी पत्नी बिमला अक्सर मुस्कराकर कहती—


“तुम लोगों को सिर्फ रास्ता नहीं दिखाते, उनमें चलने की हिम्मत भी भरते हो।”


लेकिन पिछले साल बीमारी की वजह से बिमला असमय अनंतलोक की अंतहीन यात्रा पर निकल गई थी।


उसके जाने के बाद सुरेन्दर के भीतर जैसे कुछ हमेशा के लिए से टूट गया था। पहले जो आदमी दूसरों के दुख में ढाल बनकर खड़ा रहता, अब अपने ही दुख के सामने असहाय हो गया। नतीजा, पहले लोगों से बोलना कम हुआ, फिर धीरे धीरे-धीरे बातचीत लगभग बंद ही हो गई। गाँव वालों ने इसे “अहंकार” या “पुरानी सोच” का नाम दिया, जबकि सच यह था कि वह अपने भीतर की खाली जगह को समझने की कोशिश कर रहा था।


समय के साथ नए लोग आए—तेज़, प्रैक्टिकल, और कहीं न कहीं संवेदनहीन। उन्होंने सुरेन्दर की चुप्पी को कमजोरी समझ लिया। पंचायत में उसकी जगह नए चेहरों ने ले ली। बच्चों ने अब उससे पढ़ना छोड़ दिया। जो लोग कभी उसके पास सलाह लेने आते थे, अब उसे देखकर रास्ता बदल लेते।


धीरे-धीरे सुरेन्दर एक आदत बन गया—जैसे खेत में खड़ा बिजूका, जो दिखता तो है, पर जिसके होने या न होने से किसी को फर्क नहीं पड़ता।


पर सच्चाई यह थी कि सुरेन्दर हर रोज़ उस पीपल के नीचे खड़े होकर अपने अतीत से मिलता था।


वह वहीं खड़ा होकर उन बच्चों की आवाज़ें सुनता, जो कभी उससे ‘अ’ से ‘अनार’ और ‘ क’ से ‘कमल’ सीखते थे। उसे बिमला की हंसी सुनाई देती, जब वह उसे चाय के लिए बुलाती थी। उसकी आंखें कभी-कभी भर आतीं, पर आंसू बाहर नहीं आते—जैसे उसने अपने दर्द को भी खामोश रहना सिखा दिया हो।


एक दिन, जब गांव में जमीन को लेकर बड़ा विवाद हुआ, तो वही लोग जो उसे नजरअंदाज करते थे, अचानक उसे याद करने लगे।


“सुरेन्दर समझदार है… उससे पूछो,” किसी ने कहा।


भीड़ में हलचल हुई। कुछ चेहरों पर झिझक थी, कुछ पर अपराधबोध दिख रहा था। सुरेन्दर ने यह सब देखा, पर उसके चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं थी। बिल्कुल सपाट। 


वह धीरे-धीरे आगे आया।


उसने दोनों पक्षों की बातें सुनीं—सिर्फ शब्द नहीं, उनके पीछे छिपे डर, लालच और असुरक्षा को भी महसूस किया। फिर उसने बहुत शांति से कहा—


“जमीन सिर्फ मिट्टी नहीं होती… यह रिश्तों की जड़ भी होती है। अगर जड़ ही कट गई, तो पेड़ बचा भी तो सूखा रहेगा।”


उसकी आवाज़ में कोई तर्क नहीं था, बस अनुभव था। और शायद वही बात सबको छू गई।


झगड़ा खत्म हो गया। लोग धीरे-धीरे लौटने लगे। कुछ ने उसकी तरफ देखा, जैसे पहली बार उसे सच में देख रहे हों।


पर सुरेन्दर फिर उसी पीपल के नीचे जाकर खड़ा हो गया।


क्योंकि इंसान को सिर्फ एक बार याद कर लेने से उसकी जगह वापस नहीं मिलती।


उस रात गाँव के एक छोटे-से लड़के, सोहन, ने अपनी मां से पूछा—


“माँ, सुरेन्दर काका हमेशा वहाँ क्यों खड़े रहते हैं?”


माँ कुछ पल चुप रही, फिर बोली—


“बेटा, कुछ लोग तब भी खड़े रहते हैं जब कोई उनके साथ नहीं खड़ा होता… ताकि अगर किसी को कभी जरूरत पड़े, तो वह उन्हें वहीं मिलें।”


अगले दिन, सोहन चुपचाप सुरेन्दर के पास गया और उसके बगल में खड़ा हो गया।


काफी दिनों के बाद सुरेन्दर के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान नजर आई। 


शायद वह अब भी बिजूका था…


पर उसके भीतर का इंसान पूरी तरह मरा नहीं था।