बुधवार, 13 जुलाई 2016

कुछ तो लोग कहेंगे.................

क्योंकि सास भी कभी बहू थी-फेम स्मृति इरानी एक बार फिर चर्चा में हैं। कई दिनों से फिजां में यह बात तैर रही है कि इस बार मोदी कैबिनेट की आस्तीन चौड़ी हुई तो स्मृति का कद छोटा हो गया। मीडिया पंडित से लेकर सियासत दां तक उधेड़-बुन में लगे हुए हैं कि शिक्षा (मानव संसाधन विकास) मंत्रालय जैसा अहम महकमा संभालने वाली स्मृति अब हल्के-फुल्के कपड़ा मंत्रालय में क्या करेंगी। उनकी उधेड़बुन भी ऐसी, जिसमें सिर्फ उधेड़ना है, बुनावट की गुंजाइश नहीं।

माता-पिता ने स्मति नाम चाहे जिस भी वजह से रखा हो, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि वह जहां जाती हैं, अपनी स्मृति छोड़ती हैं। स्मृति अच्छी हो या बुरी, अपनी बला से। फिर चाहे परिवार की सारी बंदिशें तोड़कर मैकडॉनल्ड्स में वेट्रेस की नौकरी करना हो, सौंदर्य प्रसाधनों के प्रचार के लिए मॉडलिंग की बात हो, या फिर फेमिना मिस इंडिया प्रतियोगिता में बतौर प्रतिभागी हिस्सेदारी। हर जगह उन्होंने अपनी स्मृतिछोड़ी।

अभिनय का भूत सवार हुआ, तो राजनीतिक राजधानी छोड़कर स्मृति ने आर्थिक राजधानी की राह पकड़ ली। दरअसल, बॉलीवुड़ वहीं जो है। सन 2000 में-हम हैं कल आज कल और कल- के जरिए स्मृति ने छोटे परदे के दरवाजे पर दस्तक दी, लेकिन दरवाजा खुला एकता कपूर के सीरियल क्योंकि सास भी कभी बहू थी से। फिर तो लगातार आठ साल यानी 2008 तक दरवाजा सिर्फ उनके ही इशारे पर खुला-बंद हुआ। किसी के पांव उस दरवाजे के पास फटक तक नहीं पाए। तुलसी के किरदार में स्मृति दर्शकों, खासतौर पर महिलाओं के दिलों पर राज करती रहीं।

छोटे परदे से छलांग लगाकर राजनीतिक आसमान पर चमकने तक की उनकी कहानी भी कम रोमांचक नहीं है। हालांकि तकरीबन पांच साल तुलसी और स्मृति का सफर साथ-साथ चला। 2003 में भाजपा की मेंबरी ली और दिल्ली के चांदनी चौक लोकसभा क्षेत्र में कांग्रेस के दिग्गज कपिल सिब्बल से दो-दो हाथ करने के लिए चुनावी अखाड़े में कूद गईं। पहले सीरियल की तरह पहली सियासी जंग में भी नाकामयाबी मिली। पर 2010 में भाजपा महिला मोर्चा की कमान संभाली तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक साल के भीतर ही बरास्ता गुजरात, राज्यसभा पहुंच गईं। 2014 में लोकसभा चुनाव हुए तो अमेठी में उनके सामने थे कांग्रेस के कुंवर और आम आदमी पार्टी के कुमार, जिन्हें विश्वास था कि जीत उन्हीं की होगी। हारीं तो स्मृति इस बार भी पर पार्टी में उनका स्वागत हुआ विजयी नायिका की तरह। कुंवर को कड़ी चुनौती देने के एवज में उन्हें बड़ा इनाम मिला। चुनाव परिणाम आने पर, जब मोदी मंत्रिमंडल का गठन हुआ तो उन्हें अहम माने जाने वाले मानव संसाधन विकास मंत्री के ओहदे से नवाजा गया। उसके बाद अपने बेलौस बयानों की वजह से दर्जनों बार वह जबरदस्त चर्चा में रहीं। कभी तारीफ मिली तो कभी जमकर आलोचना भी हुई। पिछले हफ्ते मोदी मंत्रिमंडल का पुनर्गठन हुआ तो उन्हें कपड़ा मंत्रालय थमा दिया गया।

न केवल राजनीतिक विरोधी बल्कि मीडिया पंडित और सियासद दां भी जैसे इसी मौके का इंतजार कर रहे थे। इसी बहाने उन्हें तरह तरह की कयासबाजी का मौका मिल गया। कहा तो यहां तक गया कि स्मृति के हाथ से किताब लेकर सिलाई मशीन थमा दी गई। लेकिन जब स्मृति से प्रतिक्रिया पूछी गई तो उन्होंने बीते जमाने के सुपरस्टार स्व. राजेश खन्ना को याद करते हुए केवल यही कहा....कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।

मोदी से उनकी निकटता भी अक्सर चर्चा का विषय बनती है। बेशक उनकी यह काबिलियत पार्टी में मौजूद उनके आलोचकों को फूटी आंख न सुहाती हो, लेकिन वे भी मानते हैं कि स्मृति बेखौफ महिला हैं, और अपनी बात कहने में हिचकिचाती नहीं,  नतीजा चाहे जो हो। विरोधी, आलोचक, सियासत दां और मीडिया पंडित चाहे जिस उधेड़-बुन में हों, लेकिन एक बात तो साफ है कि स्मृति बुनने में ज्यादा यकीन रखती हैं। उत्तर प्रदेश में बड़ा टेक्सटाइल बाजार है, गोरखपुर-खलीलाबाद-मऊ से लेकर मऊरानीपुर-झांसी तक बड़े पैमाने पर हैंडलूम का कारोबार होता है, बनारसी साड़ियों की अलग पहचान है तो भदोही के कालीन से भी देश-विदेश के लोग वाकिफ हैं। बुनाई उद्योग से जुड़े वोटरों (ज्यादातर मुसलिम) के बीच अपनी पैठ बनाकर वह उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का ताना-बाना बुनने में जुट सकती हैं। पार्टी को वहां वैसे भी किसी चेहरे की दरकार है। ग्लैमर का तड़का है, चेहरा जाना पहचाना है, हाजिर जवाब और अच्छी वक्ता तो खैर वो हैं ही। केंद्रीय राजनीति में रहकर सियासत का दांव-पेंच भी उन्होंने अच्छी तरह सीख लिया है। संभव है प्रधानमंत्री ने उन्हें कपड़ा मंत्रालय बहुत सोच समझकर दिया हो।

कहते हैं, इंसान की तीन बुनियादी जरूरतें होती हैं-रोटी, कपड़ा और मकान। इसमें दो राय नहीं कि शिक्षा की बदौलत इन तीनों को हासिल किया जा सकता है। लेकिन अपने प्रधानमंत्री जी का तो काम करने का तरीका ही निराला है। विरोधी भले उन्हें फेंकू पुकारते हों, लेकिन पलटवार कर जब वह जवाब फेंकते हैं, तो सामने वाले को पोछते नहीं बनता। संभव है कि छोटी-छोटी बातों पर गौर करने वाले मोदी को लगा हो कि स्मृति कपड़ा का इंतजाम करें, रोटी और मकान की जिम्मेदारी कोई और संभाल लेगा। फिर लोग कहेंगे-क्योंकि स्मृति भी कभी मानव संसाधन विकास मंत्री थी।

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

राइटर (लेखक), राइट (सही) और राइअट (दंगा)

अंग्रेजी के तीन शब्द- राइटर (लेखक), राइट (सही) और राइअट (दंगा)- आजकल देश की दशा और दिशा तय करते नजर आ रहे हैं। अखबार हों या सरकार, विपक्ष हो या विश्राम कक्ष, हर जगह चर्चा के केंद्र में शब्दों की यही तिकड़ी है। इनके बिना न सुबह की प्याली हलक से नीचे जा रही है, न शाम का प्याला। तमाम लोगों को तो सपने में भी ये तीन शब्द परेशान कर रहे हैं। 

सबसे पहले राइटर पर चर्चा। एक खास विचारधारा से प्रतिबद्ध राइटर जमात को लगता है कि प्रगतिशीलता पर उनका पुश्तैनी हक है, विकास की बात करने वाले बाकी सारे लोग ठकुरसुहाती कर रहे हैं। फिर चाहे शोभा डे हों, उदय प्रकाश हों नयनतारा सहगल, सारह जोसेफ या फिर अशोक वाजपेयी। इन तमाम लबड़हत्थे राइटर को लग रहा है कि चार दशक बाद देश में एक बार फिर से इमरजेंसी का जिन्न बोतल से बाहर निकल आया है। देश के सामाजिक ताने बाने को बिगाड़ने की कोशिश करते हुए एक कार्य योजना के तहत साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र को खासतौर पर निशाना बनाया जा रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटा जा रहा है और हिंदुत्ववादी ताकतें सबकुछ अपने मनमुताबिक कर रही हैं। उन्हें लोकतंत्र, सेक्युलरिज्म और सौहार्द्र पर भी खतरा मंडराता नजर आ रहा है। शायद इसीलिए उन्हें लगता है कि इसे किसी भी हाल में तत्काल रोकना निहायत जरूरी है। और इसके लिए साहित्य अकादमी अवार्ड लौटाने से कारगर कोई अन्य हथियार हो ही नहीं सकता।

उदय प्रकाश, सारह जोसेफ और अशोक वाजपेयी के अवार्ड लौटाने के साथ जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह अरविंद मालागट्टी, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी,  गणेश देवी, एन. शिवदास, कुम वीरभद्रप्पा, गुरबचन सिंह भुल्लर, अजमेर सिंह औलख, आत्मजीत सिंह और वारयाम सिंह संधू पर खत्म होने वाला नहीं लगता। आने वाले दिनों में अवार्ड लौटाने की और घटनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता।

वाम विचारधारा वाले इन राइटर को लगता है कि -अभी नहीं तो कभी नहीं- वाली निर्णायक घड़ी आ गई है। उनका सारा विरोध हाल में घटी दो प्रमुख घटनाओं को लेकर है। पहला लेखक एम.एम. कलबुर्गी और गोविंद पानसरे की हत्या और दूसरा दादरी के एक गांव में बीफ खाने को लेकर, पगलाई भीड़ के हाथों अखलाक का कत्ल। फिलवक्त, मुंबई में गजलगो गुलाम अली का कन्सर्ट रद्द होने को भी इसी के साथ जोड़ दिया गया है। इसकी मुखालफत करते हुए ये राइटर जिस हिसाब से अवार्ड लौटा रहे हैं, उससे तो यही लग रहा है कि इस आंकड़े को शतक बनाने में देर नहीं लगेगी।

अवार्ड लौटाने वाली इस राइटर जमात से अब यह पूछने की जहमत कौन उठाए कि 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए देशव्यापी राइअट में जब लगातार तीन दिनों तक भेड़-बकरियों की तरह सिखों का कत्लेआम किया जा रहा था, बाबरी विध्वंस के बाद 1993 में जब देश की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई राइअट की चपेट में आकर कई दिनों तक धू-धू चल रही थी या फिर गोधरा की घटना के बाद 2002 में जब गुजरात में हुए राइअट में सांप्रदायिक सौहार्द की होलिका जलाई जा रही थी, तब इनकी आत्मा ने इन्हें क्यों नहीं झकझोरा।

यही नहीं, मलियाना-हाशिमपुरा कांड में जब सैकड़ों लोग मारे गए, तब अकादमी पुरस्कार लौटाने की बात इनके जेहन में क्यों नहीं आई। 2011 में मुंबई के ताज होटल सहित कई इमारतों पर हुए हमलों में जब देसी-विदेशी सैकड़ों बेकसूर लोगों को जान से हाथ धोड़ा पड़ा, जब मुजफ्परनगर में राइअट हुआ, तब इनके अर्न्तमन ने इन्हें क्यों नहीं धिक्कारा। यह तो महज बानगी है, इस तरह के राइअट और वाकयों से आजाद भारत का इतिहास अटा पड़ा है। 1954 में साहित्य अकादमी पुरस्कारों की शुरुआत के बाद नेल्ली, राउरकेला, जमशेदपुर, मुरादाबाद, कोकराझार समेत तमाम जगहों पर हुए राइअट ने देश के तथाकथित सेकुलर चरित्र पर बदनुमा दाग लगाया, पर इससे पहले कभी इस तरह अवार्ड लौटाने वाली आंधी नहीं चली।

अवार्ड लौटाने वालों के बावलेपन को देखकर पहली नजर में तो यही लगता है कि लेखकों की इस जमात का- सुविधा के समाजशास्त्र - में पक्का यकीन है। यानी वाकया बड़ा हो चाहे छोटा, किसी गांव या मुहल्ले में हो या फिर उसका दायरा कोई पूरा इलाका या सूबा हो, उनको महज इस बात से मतलब है कि वह उन्हें सूट कर रहा है या नहीं। सूट किया तो अवार्ड लौटाने वाला लोकाचार, नहीं सूट किया तो वाकये से आंखे फेर लो यार।

अब राइट (सही) पर भी थोड़ी बात कर ली जाए। प्रगतिशील कलबुर्गी, दाभोलकर, पानसारे या अल्पसंख्यक अखलाक की हत्या हुई/कराई गई, इसमें कोई संदेह नहीं। हत्या जैसे इस कुकृत्य को कोई राइट ठहरा भी नहीं सकता। हत्या अगर रांग है, तो रांग है, उसके राइट ठहराने के पक्ष में किसी तर्क की कोई गुंजाइश नहीं बनती।

एक संयोग यह भी है कि कलबुर्गी, दाभोलकर, पानसारे और अखलाक अपनी हत्या के बाद जबरदस्त चर्चा में आ गए। इनकी हत्या के बाद इस कदर शोर मचा कि हर खासो-आम हैरान रह गया। आखिर ऐसा क्या खास था कि इनकी ही हत्याएं मीडिया की सुर्खियां बनीं। अखबारों के पन्ने रंगे गए, टीवी पर तमाम बड़ी खबरें बेमौत मरने को मजबूर हुईं। कलबुर्गी को जब अकादमी पुरस्कार मिला था, तब उनकी चर्चा साहित्य में रुचि रखने बुद्धिजीवी वर्ग तक ही सिमट कर रह गई थी, आम आदमी को तो याद भी नहीं होगा कि किस रचना के लिए और किस साल उन्हें अवार्ड मिला था। अलबत्ता, पैन इंडियन प्रसिद्धि उन्हें मरणोपरांत जरूर मिली।

दाभोलकर, पानसारे और अखलाक को भी देश का आम आदमी तभी जान पाया, जब चंद आतताइयों ने उनका सिर कलम कर दिया। आतताइयों की वैसी भी कोई मजहब या जाति नहीं होती। ठीक आतंकवादियों की तरह। अब यह दीगर बात है कि अखलाख के कत्ल के लिए हिंदुओं को कसूरवार ठहराया गया, जबकि दाभोलकर और कलबुर्गी की हत्या का आरोप दक्षिणपंथियों के सिर मढ़ा गया। जानकार बताते हैं कि आजाद भारत के इतिहास लेखन में भी इसी तरह की बाजीगरी की गई है।

किसी ने ठीक कहा है कि कब किसकी किस्मत चमकेगी, कोई नहीं जानता। किसी की जीते जी चमक जाती है और किसी की मौत के बाद। कुछ मर कर अमर हो जाते हैं, तो कुछ मर कर घरवालों के लिए अकूत संपदा का इंतजाम कर जाते हैं। अब अखलाक को ही ले लीजिए। जीते जी उसने सपने में भी सोचा नहीं होगा कि उसकी मैय्यत उठने के बाद सूबे की सरकार की मेहरबानी से परिवार वालों की लाटरी खुल जाएगी। नोटों की बरसात होने लगेगी।


आप अगर राइटर हैं, खासतौर पर वामपंथी राइटर तो आपकी कलम राइट-रांग का हिसाब रखेगी ही। आपको हर उस वाकये में राइअट की बू आएगी, जिसको आपके हिसाब से राइटिस्ट या देश की बहुसंख्यक आबादी ने अंजाम दिया है। आपको प्रधानमंत्री या साहित्य अकादमी के चेयरपर्सन की चुप्पी पर भी हैरानी होगी। और हो भी क्यों न, आखिर बुद्धि पर एकमुश्त अधिकार आपका ही तो है।  

सोमवार, 21 सितंबर 2015

बीपीएल सीरीज में बीपीएल वोटों पर मारामारी

बीपीएल (बिहार पॉलिटिकल लीग) वन-डे सीरीज का ऐलान हो चुका है। पांच मैचों वाली इस सीरीज का आगाज 12 अक्टूबर को हो रहा है, जबकि आखिरी मैच 5 नवंबर को खेला जाएगा। बाकी के तीन मैच 16 व 28 अक्टूबर एवं 1 नवंबर को होंगे। सीरीज के नतीजे 8 नवंबर को आएंगे।

एसपी-एनसीपी और लेफ्ट फ्रंट को मिलाकर वैसे तो सीरीज में कुल चार टीमें हिस्सा ले रही हैं, पर असली मुकाबला महा-गठबंधन (जेडी-यू, आरजेडी, कांग्रेस) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक (राज)-गठबंधन (बीजेपी, एलजेपी, हम व आरएलएसपी) के बीच ही है। दोनों टीमें सीरीज पर कब्जा जमाने के लिए जोर-शोर से तैयारी में जुटी हुई हैं। नेट प्रैक्टिसों का दौर जारी है। जीत की रणनीति बनाने के लिए कोच और अनुभवी खिलाड़ियों की भी मदद ली जा रही है। मजेदार यह कि बीपीएल सीरीज में सबसे ज्यादा मारा-मारी बीपीएल (बिलो पावर्टी लाइन) वोटों को लेकर है। उन्हें रिझाने-पटाने के लिए सारे तीर-तिकड़म आजमाए जा रहे हैं। पहले आजमाए जा चुके नुस्खों पर भी अमल किया जा रहा है। बीपीएल वोट (इसमें दलित-महादलितों की तादाद सबसे अधिक है) जिसकी तरफ झुक जाएंगे, जीत का सेहरा उसी के सिर बंधेगा।

टीम महागठबंधन के कैप्टन, मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद को बीपीएल वोटरों का सबसे बड़ा खैरख्वाह बता रहे हैं। लोहार जाति को अनुसूचित जाति में शामिल कराने का रिकार्ड पहले ही वह अपने नाम करा चुके हैं। उनकी मानें तो उन्होंने सिर्फ दलितों का ही नहीं, बल्कि महादलितों का भी भला किया है। यह दीगर बात है कि उनके इस दावे को लेकर उनकी, अपनी टीम के मास्टर ब्लास्टर यानी लालू जी से ठनी हुई है। लालूजी को भला कैसे यह गंवारा हो सकता है कि पिछले करीब एक दशक से जिस बीपीएल की उन्होंने दुकानदारी की, आम खाने का वक्त आने पर कोई दूसरा उन्हें गुठली थमा दे। दोनों अपने को बीपीएल वोटरों का मसीहा साबित करने में दिन-रात एक किए हुए हैं। सुशासन बाबू और कुशासन बाबू नाम से शोहरत बटोर चुके दोनों नेताओं की इसी नूरा-कुश्ती के चलते सोनिया जी की कांग्रेस ने बीपीएल वोटों पर अभी तक अपना हक नहीं जताया है। राहुल बाबा भी इस बार किसी दलित या महादलित के यहां भोज पर नहीं जा रहे हैं।

लोकसभा चुनावों में गैर राजग दलों का हश्र देख, महागठबंधन की नींव रखने वाले माननीय नेता जी उर्फ मुलायम सिंह यादव भी शायद इन्हीं सब वजहों से गांठ खोलकर बंधन मुक्त कर चुके हैं। वैसे भी, कोई माने या ना माने पर, क्रिकेट सॉरी कुश्ती के असल पहलवान-माफ कीजिएगा खिलाड़ी तो वो ही हैं। अबकी बार वह अकेले ही बल्लेबाजी करेंगे।

राज-गठबंधन का किस्सा भी कुछ खास अलग नहीं है। राम बिलास पासवान के चिराग अब खुद को बीपीएल का स्वाभाविक चिराग साबित करने की हरसंभव कोशिश में हैं। उनका कहना है कि बीपीएल वोटरों को उनका वाजिब हक, केंद्र में मंत्री रहते उनके पिता ने ही दिलवाया। वह उनके पिता ही हैं, जिन्होंने बीपीएल वोटरों की जिंदगी में चिराग रौशन किया। सो बीपीएल वोटरों पर सबसे ज्यादा हक उन्हीं का बनता है। 

उधर, दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) की कामयाबी से प्रभावित होकर उसी की तर्ज पर हिंदुस्तान अवाम मोर्चा (हम) बनाने वाले सूबे के शार्ट टर्म सीएम रहे जीतन राम मांझी को लगता है कि नाव तो सिर्फ मांझी ही पार लगा सकता है, फिर चाहे उस पर बीपीएल वोटर सवार हों या फिर हम या आप कोई भी। यही वजह है कि आए दिन राज-गठबंधन के दोनों राम (जीतन राम और राम बिलास) में यह साबित करने की होड़ लगी रहती है कि बीपीएल वोटरों का असली नुमाइंदा कौन है? हम तो बस यही कह सकते हैं कि राम की माया राम ही जानें।

कुरमी-कोइरी वोटरों के बूते सूबे की राजनीति में मजबूत दखल रखने का दावा करने वाले कुशवाहा का भी दिल है कि मानता नहीं। उन्हें लगता है कि इस बार की बीपीएल सीरीज में अपने कोटे के जितने खिलाड़ियों को टीम में शामिल करा लिया जाए, उतना ही आगे की राजनीति के लिए बेहतर रहेगा। 

केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी इस भी सीरीज में बीपीएल को लेकर कम चिंतित नहीं है। उसे इस बात का बेहतर अंदाजा है कि सूबा बिहार के लगभग 40 लाख बीपीएल परिवारों से ताल्लुक रखने वाले वोटर किसी भी सियासी दल का खेल बना या बिगाड़ सकने का माद्दा रखते हैं। बीपीएल वोटरों की अहमियत समझते हुए ही बीजेपी शासित किसी सूबे में अन्त्योदय कार्यक्रम चलाया जा रहा है, कहीं उन्हें किफायदी दर पर चावल दिया जा रहा है, तो कहीं घर बनाने के लिए जमीन, बिजली बिल में माफी और विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति दी जा रही है। यह भी सबको पता है कि बीपीएल समीकरण को ध्यान में रखते हुए ही बीजेपी ने सूबे में एलजेपी, हम और आरएलएसपी को साथ रखा है। यही नहीं, शायद इसी वजह से पार्टी ने अभी तक सीएम पद के लिए किसी के नाम की घोषणा नहीं की है। 

अब यह तो वक्त ही बताएगा कि बीपीएल वोटरों के सहयोग से बीपीएल सीरीज पर किसका कब्जा होगा। हम इंतजार करेंगें नतीजा आने तक।


शनिवार, 25 अप्रैल 2015

पइसा मत फेंको, तमाशा देखो

भारत महान परंपराओं वाला देश है। तमाम परंपराओं की तरह अनादि काल से यहां तमाशबीन बने रहने की भी परंपरा रही है। लोग-बाग घर फूंककर तमाशा देखने जाते हैं। फिर तमाशा चाहे भालू का हो या बंदर का। सड़क पर हो या संसद के अंदर का। नेता का हो या अभिनेता का। भिखारी का हो या मदारी का।
तमाशा तो आखिर तमाशा है। तमाशा है, तो मजमा लगेगा ही। दोनों का जैसे चोली-दामन का साथ हो। हर तमाशे में यही होता है। डमरू कोई बजाएगा और खेल कोई और दिखाएगा। उस मजमें में भी वही हुआ, जो पिछले दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर लगा था। मंच सजा था, भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का विरोध करने के लिए। हजारों की भीड़ जुटी थी। झाड़ूबरदारों का एक तमाशा चल ही रहा था कि सामने नीम के पेड़ पर शुरू हुए एक दूसरे तमाशे ने मानो महफिल लूट ली।
तमाशे में शामिल होने के लिए राजस्थान के दौसा जिले से आए किसान बताए जा रहे गजेंद्र सिंह ने नीम के पेड़ पर चढ़कर अपने गले में गमछा बांध लिया और फिर कथित तौर पर सरेआम खुदकुशी कर ली। दूर-दूर से जुटाई गई किसान जमात तो खैर तमाशा देखने के लिए ही आई थी, पर हैरान कर देने वाली बात यह है कि जिम्मेदार आप बहादुर, मीडिया और पुलिस भी तमाशा देखने में मशगूल हो गई। गोया, ऐसा तमाशा पहले कभी देखा-सुना ही नहीं हो।
उसके बाद तो आरोप-प्रत्यारोप का जो खेल शुरू हुआ, उसका भी कोई सानी नहीं है। कोई सूबा दिल्ली पर हुकूमत करने वाली आम आदमी पार्टी को दोषी ठहरा रहा है, तो कोई आजाद भारत पर सबसे अधिक समय तक राज करने वाली कांग्रेस पार्टी को। केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी भी आरोपी होने से बच नहीं सकती। उसके दामन पर भी छींटे लगे हैं। सच तो यह है कि सब अपनी अपनी रोटी सेंकने में लगे हुए हैं।
उधर, जब से भूमि अधिग्रहण अध्यादेश आया है, तब से देश भर के नेताओं में किसान नेता बनने की होड़ लग गई है। हमारा देश भले ही कृषि प्रधान हो, पर किसान नेता की कमी तो सालती ही है। किसानों के सर्वमान्य नेता चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत हमको अलविदा कह गए और चौ. अजित सिंह को किसान नेता मानने को कोई तैयार नहीं। सो किसान नेता की खाली कुर्सी पर कब्जे के लिए तलवारों पर सान चढ़ाई जा रही है। नारे गढ़े जा रहे हैं। रैलियां हो रही हैं। चाहे विपश्यना कर लौटे अपने युवराज हों या फिर दूसरी बार दिल्ली का तख्त संभाल रहे अपने धरना सम्राट। सबको बनना है किसान नेता। बह रही है गंगा, डुबकी लगा लो और बन  जाओ किसान नेता, ऐसा मौका फिर न मिलेगा।
और बेचारे किसान तो जैसे खुदकुशी करने के लिए ही पैदा हुए हैं। चाहे महाराष्ट्र के किसान हों या बुंदेलखंड के। कहीं कोई किसान कर्ज के बोझ तले दबे होने की चिंता में जान दे रहा है, तो कोई अपनी आंखों के सामने अपनी फसल की बर्बादी देखकर। और सोने पे सुहागा यह कि जब से नमो ने अपनी किस्मत पर इतराना शुरू किया, तब से कुदरत ने भी किसानों पर अपनी खास मेहरबानी दिखाने का सिलसिला शुरू कर दिया। बेमौसम बारिश से देश भर में रबी की फसल को कितना नुकसान पहुंचा है, अभी इसको लेकर जोड़-घटाना किया जा रहा है।
हां, कहीं कहीं मुआवजे की रस्म अदायगी भी शुरू हो गई है। अखबारों में कभी किसानों को बतौर मुआवजा दो रुपये देने की खबर आ रही है तो कभी 75 रूपये देने की। अब इन बावलों को कौन समझाए, मुआवजे की इतनी रकम से किसान कौन सा कोदो उखाड़ लेंगे। और अब जरा, मुआवजे की रकम तय करने वाले नेताओं की सोचिए। फसल की बर्बादी और मुआवजे की इत्ती सी रकम से जहां किसानों के दिल टूट रहे हैं, वहीं नेताओं के दिल मिल रहे हैं। बीजेपी और नमो की शक्ल तक से बिहार के जिस मुख्यमंत्री को नफरत हो गई थी, वही पूर्णिया और आस-पास के इलाकों में तूफानी बारिश के बाद बदले हालात में केंद्र सरकार की सक्रियता को लेकर नमो का गुणगान कर रहे हैं।
जंतर मंतर पर खुदकुशी करने वाले गजेंद्र के घरवाले भले ही उसे शहीद का दर्जा दिए जाने मांग कर रहे हों, लेकिन एक बात तो पक्की है कि जान भले किसी की गई हो, पर मौत आप बहादुरों की हुई है। शायद उन्हें इस बात का अहसास भी हो गया है। तभी तो सूरमा माफी मांग रहे हैं। भाई कितनी बार माफी मांगोगे। गलती करना तो आपकी नियति है। डैमेज कंट्रोल के क्रम में कोई झाड़ूबरदार आंसू बहा रहा है, कोई घर वालों के आंसू पोंछने का प्रहसन करते हुए 10 लाख का चेक लेकर जा रहा है। उधर, गजेंद्र के घर वाले हैं कि किसी को माफ न करने की कसम खाए हुए हैं।
भूमि अधिग्रहण अध्यादेश, कानून बनकर अमल में आए या न आए, किसानों की खुदकुशी का सिलसिला थमे या न थमे, पर इसमें कोई दो राय नहीं कि गजेंद्र ने जान देकर किसानों को फिर से सेंटर स्टेज पर ला दिया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि किसानों की चर्चा महज बुलबुला साबित होती है या फिर वास्तव में उनके अच्छे दिन आएंगे।




सोमवार, 8 सितंबर 2014

भारत भाग्य विधाता

शिक्षक दिवस (5 सितंबर) के अवसर पर देशभर के स्कूली बच्चों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीधी बातचीत को लेकर देश में खूब चर्चा हो रही है। बातचीत के लिए प्रधानमंत्री को जम कर कोसा रहा है। डंका पीटा जा रहा है कि बच्चों से बातचीत कर प्रधानमंत्री ने जघन्यतम अपराध किया है। अखबारों में लेख लिखे जा रहे हैं, परिचर्चा के लिए टीवी चैनलों में होड़ लगी है, सोशल मीडिया के पन्ने रंगे जा रहे हैं। मोदी कुपित तबका नुक्कड़ -चौराहों पर इसकी चर्चा कर गौरवान्वित हो रहा है। पर शायद, सब पर भारी है सोशल मीडिया।
इसे सोशल मीडिया का ही कमाल कहेंगे कि शिक्षक दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री-स्कूली बच्चों की सीधी बातचीत ने जाने-अनजाने बंगलुरु में रहने वाले द हिन्दू के नायाब फोटोग्राफर भाग्य प्रकाश के भाग्य का पिटारा खोल दिया। भाग्य प्रकाश ने इससे पहले न जाने कितनी तस्वीरों को अपने कैमरे में कैद किया होगा, पर शिक्षक दिवस के मौके पर उनके कैमरे में कैद हुई एक नायाब तस्वीर ने फौरी तौर पर उन्हें देश का सबसे चर्चित छायाकार बना दिया है। अब यह बात तो भाग्य प्रकाश ही बता बताएंगे कि छींका बिल्ली के भाग्य से टूटा या फिर उनके।
दरअसल, भाग्य प्रकाश ने जिस तस्वीर को अपने कैमरे में कैद किया है, उसमें एक क्लास में लगी टीवी पर मोदी के संबोधन का सजीव प्रसारण हो रहा है। उसी बीच एक छोटा बच्चा अपनी स्वाभाविक जरूरत पूरी करने के लिए क्लास से बाहर जाने की अनुमति मांग रहा है, जबकि उपस्थित शिक्षिका उसे ऐसा करने से मना कर रही है। बस एक स्वाभाविक घटना को हमारा सोशल मीडिया ले उड़ा, गोया प्रधानमंत्री कार्यालय से कोई विशेष अधिसूचना जारी हुई थी कि मोदी के भाषण के दौरान सभी बच्चे सावधान की मुद्रा में बैठे रहेंगे, उनकी पैंट गीली हो तो अपनी बला से।  


इसमें दो राय नहीं हो सकती कि स्वाभाविक जरूरतें सबको परेशान करती हैं। वो मोदी मुदित लोग भी हो सकते हैं और मोदी कुपित लोग भी। यह बात महिलाओं पर भी लागू होती है और पुरुषों पर भी। युवाओं पर भी लागू होती है और बुजुर्गों पर भी। स्कूली बच्चों पर भी और शिक्षक-शिक्षिकाओं पर भी।
स्कूली बच्चा एकबारगी अपनी स्वाभाविक जरूरत से समझौता नहीं कर पाया, यह बात तो समझ में आती है, पर अगर कोई शिक्षक या शिक्षिका सबकुछ समझ कर भी नासमझी करे तो इसके लिए दोषी कौन है। क्या उसके संस्कार, क्या उसकी शिक्षा या फिर वह माहौल, जिसमें वह पली-बढ़ी है। या फिर देश की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था दोषी है, मौजूदा शिक्षा मंत्री दोषी हैं या मौजूदा प्रधानमंत्री। या फिर वे जिन्होंने हर चीज में कमी ढूंढने का शगल पाल रखा है।
कहां तो इस बात की खुले दिल से प्रशंसा होनी चाहिए थी, कि चलो किसी प्रधानमंत्री ने बच्चों से सीधी बात करने की पहल तो की। बाल मन में झांकने की कोशिश तो की। उनकी हौसला आफजाई तो की। याद नहीं आता कि इससे पहले किसी प्रधानमंत्री ने (चाचा नेहरू का जमाना मुझे याद नहीं) कभी इस तरह की कोशिश की थी। अलबत्ता पूर्व राष्ट्रपति डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम बच्चों के हर सवाल का जवाब देने को तैयार रहते थे। और कहां अब यह बहस छिड़ चुकी है कि क्या इस करवा चौथ पर चांद निकलने से पहले प्रधानमंत्री मोदी देश की महिलाओं को संबोधित करेंगे।

जय भाग्य, जय भारत...............  

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

तू मसीहा जमाने के मारों का है......

सूचना का अधिकार क्रांति के पुरोधा अरविंद केजरीवाल ने अपने वर्षों के संघर्ष और सूबा दिल्ली के हुक्मरानों की सूची में अपना नाम लिखवाकर, आम को दरअसल खास बना दिया। वरना, आम की हैसियत तो गुठली जैसी हो कर रह गई थी।
आम को उसका वाजिब हक दिलाने के लिए जब मुहिम की शुरुआत हुई तो हिमायतियों की पूरी फौज खड़ी हो गई। आम और खास का फर्क मिट गया। फिर चाहे अन्ना हजारे हों या किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल हों या मनीष सिसोदिया, जनरल वीके सिंह हों या फिर मेघा पाटकर, सब एक झंडे के नीचे खड़े हो गए। दिल्ली के जंतर मंतर से फूटी धारा ऐतिहासिक रामलीला मैदान पहुंचते-पहुंचते समंदर में तब्दील हो गई। कहा जाने लगा कि गंगा, यमुना में डुबकी लगाना बेकार, बैकुंठ तो समंदर स्नान से ही मिलेगा।
भीड़ बढ़ी तो एक रास्ता कम पड़ने लगा। फिर जिसको जो राह आसान लगी, वो उसी पर चलने लगा। अन्ना और किरण बेदी को पुराना रास्ता ही ठीक लगा। हालांकि बीच-बीच में अन्ना के तृणमूल कांग्रेस में और किरण बेदी के भाजपा में जाने की अफवाहें उड़ती रहीं। वीके सिंह भी कुछ दिन अन्ना का साथ निभाते रहे, पर आखिरकार उन्होंने हाथ में कमल उठा लिया। अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने नई राजनीतिक पार्टी बना ली। दिल्ली के विधानसभा चुनाव की वजह से जल्द ही उनके इम्तिहान का मौका आ गया। और वे कामयाब भी हुए।
गुलामी की मानसिकता हमें विरासत में मिली है। सो, भारत में रहने के नाते ज्यादातर लोगों ने अंग्रेजी की यह कहावत सुनी  होगी-नथिंग सक्सीड्स लाइक सक्सेस। यह आम आदमी पार्टी यानी आप पर पूरी तरह फिट बैठती है। आप ने सूबा दिल्ली का ताज शीला दीक्षित की उसी कांग्रेस की मदद से हासिल कर लिया, जिसके खिलाफ उसने जंग लड़ी थी। फिर तो सारी बातें बेमानी हो गईं क्योंकि वे कामयाब जो हो गए थे। सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी भाजपा मन मसोस कर रह गई। बेचारे डॉ. हर्षवर्धन।
समूची मीडिया बिरादरी आप की कामयाबी के करिश्मे से हैरान थी। तारीफ के पुल बांधने के लिए अखबारों और खबरिया चैनलों में जगह कम पड़ने लगी। लेकिन बैसाखी पर टिकी सरकार आखिर कितने दिन चलती। सात हफ्तों तक तमाम वायदे-घोषणाएं, लटके- झटके, धरना-प्रदर्शन चलते रहे। आप के चुनिंदा कामरेडों ने रेल भवन के सामने हाड़ कंपाने वाली ठंड में सड़क पर रात बिताई तो एक बारगी लगा कि गणतंत्र दिवस समारोह भी संपन्न हो पाएगा या नहीं। बात-बात में जनता की अदालत में जाने का दम भरने वाले आम आदमी के नए मसीहा ने 49वें दिन सबको अधर में छोड़कर पतली गली का रास्ता पकड़ लिया। लोगों को ऱणछोड़दास याद आने लगे। क्योंकि कांग्रेस ने तो कम से कम अपनी बैसाखी नहीं छीनी थी।
उनके आंधी की तरह आने और तूफान की तरह जाने का अंदेशा किसी को नहीं था। शायद खुद आप को भी। वजूद बचा रहे, तिलिस्म टूटने न पाए, इसके लिए तरह-तरह की जुगत भिड़ाई गई। अय्यारी का सहारा लिया गया। फिर बिना पूरी तैयारी के ही आम चुनावों कूदने का फैसला हो गया। चर्चा में बने रहने के लिए, राहुल गांधी के खिलाफ कुमार विश्वास को उतारा गया तो नरेंद्र मोदी को चुनौती देने के लिए खुद मसीहा ही एक बार फिर से रणक्षेत्र में कूद गया। महात्मा गांधी से लेकर लाल बहादुर शास्त्री तक के वंशजों को साथ जोड़ा गया। अब आने वाली 16 तारीख को आने वाले नतीजे साफ कर देंगे कि आम आदमी खास बना या फिर उसकी औकात फिर गुठली जैसी हो गई।   
सच कहें तो बात चाहे आम की हो या आम आदमी की, दोनों खास बने हुए थे, लेकिन फिलहाल दोनों बहुत खऱाब दौर से गुजर रहे हैं। यूरोपीय यूनियन ने आमों का राजा कहे जाने वाले अल्फांजो के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है। अब आम आदमी की जमात में शामिल अल्फांजो आम की खेती करने वाले किसान अपना सिर पकड़ कर रोएं तो अपनी बला से।

यह बात दीगर है कि यूरोपीय यूनियन को यह बात समझ में आ गई कि विदेशी तो अल्फांजो का मजा लूटें और जहां वह पैदा होता है, वहां के लोग उसके लिए लार टपकाएं, यह सही नहीं है। हिंदुस्तान के आम आदमी के लिए कोई यूनियन ऐसा कब सोचेगी कहना मुश्किल है। फिलहाल जो लहर है, उसे देखते हुए अंदाजा लगाना मुश्किल है कि आम आदमी का नया मसीहा बहकर किस किनारे लगेगा। कश्मीर वाले अपने फारूक साहेब तो पहले ही कह चुके हैं कि मोदी को वोट देने वाले आम आदमी को समंदर में डूब जाना चाहिए।

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

14 तारीख, 15वां जलसा, 16 की सौगात

कल यानी 14 मार्च को श्रीमती सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष का पद भार संभाले 15 साल हो गए । जश्न के इस मौके पर कांग्रेस नीत यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलाएंस (यूपीए) सरकार के मंत्रियों ने 16 साल में सहमति से सेक्स के हक के एलान के रूप में एक तीर से दो निशाने किए। एक तरफ तो देश को नायाब तोहफा देने का प्रहसन हुआ और दूसरी तरफ यथा नाम तथा गुण की प्रासंगिकता साबित करने का ढोंग कि यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलाएंस वास्तव में प्रोग्रेसिव है। कैबिनेट का यह फैसला अगर कानून की शक्ल लेता है तो फिर 16 साल की उम्र में सहमति से सेक्स को जायज माना जाएगा। 16 बरस की बाली उमर को सलाम।
कैबिनेट का यह अहम फैसला इसलिए काबिले तारीफ है, क्योंकि कैबिनेट ने सहमति से सेक्स की उम्र 16 साल करने पर सहमति बनाने में जरा भी देर नहीं लगाई। यह अलग बात है कि केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ सहमति से सेक्स की उम्र 18 साल ही रहने देने पर अड़ी हुई थीं। बुरा हो 16 दिसंबर की उस काली रात का, जिसकी वजह से यूपीए कैबिनेट को इतने अहम फैसले पर आनन फानन में मुहर लगानी पड़ी। बुरा इसलिए, क्योंकि देश को शर्मसार करने वाली उस रात की अभागी घटना के बाद से अखबारों के पन्ने बलात्कार की घटनाओं से अटे पड़े हैं। लग रहा है जैसे उस घटना ने उत्प्रेरक यानी कैटेलेटिक एजेंट का काम किया हो। क्या स्कली बच्चियां, क्या नवयौवनाएं, अब तो दादी-नानी की उम्र वाली भी बलात्कारियों का निवाला बन रही हैं।
कैबिनेट का तर्क है कि आज के परिवेश में बच्चे कम उम्र में ही समझदार हो जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि सेक्स एजूकेशन और इंटरनेट की एक्सेसिबिलिटी से 16 साल की उम्र में ही बच्चों में अच्छे-बुरे का फर्क समझने की काबिलियत आ जा रही है। अब चूंकि देश में मैरेज एजूकेशन स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है, इसलिए शादी की उम्र 18 साल रहेगी, क्योंकि बकौल सरकार उसके लिए समझदारी 18 की उम्र में ही आ सकती है। यानी सहमति से सेक्स करते रहिए, लेकिन शादी की तय उम्र जस की तस रहेगी। कैरीकुलम का हिस्सा नहीं होने की वजह से वोटिंग राइट भी 18 साल में ही मिलेगा। ड्राइविंग भी स्कूलों में नहीं पढ़ाई जाती, सो ड्राइविंग लाइसेंस के लिए 18 साल के होने का इंतजार करना पड़ेगा। तो क्या मान लिया जाए कि कल को जब देश में साइबर लिटरेसी और बढेगी, तो सहमति से सेक्स की उम्र सीमा 12 साल हो जाएगी। सच कहूं तो 14 मार्च को हुए इस अहम फैसले के बाद यह तय करना मुश्किल हो गया है कि यूपीए सरकार के राज में देश वास्तव में प्रोग्रेस कर रहा है या हम उस जमाने में लौट रहे हैं, जब बाल विवाह प्रचलन में था।
कैबिनेट ने अपने फैसले में कहा है कि महिलाओं को घूरना या उनका पीछा करना भी गैर जमानती अपराध माना जाएगा। यानी कानून बनने के बाद अगर किसी महिला ने झूठा आरोप लगा दिया तो भी सजा भुगतने के लिए तैयार रहिए। बलात्कार की स्थिति में तो मेडिकल जांच से पीड़िता के आरोपों की पुष्टि हो जाती है, लेकिन घूरने या पीछा करने के आरोप की पुष्टि के लिए सरकार कौन सा टेस्ट या तरीका इजाद करेगी, इसका बेसब्री से इंतजार है। दहेज उत्पीड़न कानून का किस तरह दुरुपयोग हुआ यह बताने की जरूरत नहीं है। अगर घूरना या पीछा करना गैर जमानती अपराध बना तो वह पड़ोसी मुल्क के ईश निंदा कानून (ब्लैसफैमी) की तरह ही होगा, जिसमें किसी तरह के सबूत की जरूरत नहीं होती। इस काले कानून की वजह से हाल में लाहौर के बादामी बाग इलाके में ईसाइयों के 150 से ज्यादा घर जला दिए गए।
दरअसल हुआ यह कि वहां कच्ची शराब का धंधा करने वाले मसीह और इमरान नाम के दो दोस्त रोज शाम को साथ बैठकर दारू पीते थे। एक दिन पीने के दौरान दोनों में किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया। मसीह को भारी पड़ता देख इमरान ने शोर मचा दिया कि वह पैंगबर मोहम्मद साहब को बुरा भला कह रहा है। बस देखते ही देखते हजारों लोग जमा हो गए। पूरे इलाके में दंगा हो गया और सैकड़ों घर आग के हवाले। किसी के पास इस बात का सबूत नहीं था कि मसीह ने दरअसल कहा क्या है। किसी ने यह जानने की जहमत भी नहीं उठाई कि जब इस्लाम में दारू पीना, बनाना या बेचना हराम है तो फिर इमरान किस हक से इस काम को बेखौफ होकर अंजाम दे रहा था। इससे पहले ब्लैसफैमी का इल्जाम लगाकर वहां एक गवर्नर को सरेआम कत्ल करने की घटना अभी भूली नहीं है।
वह दिन दूर नहीं जब फिल्में भी इस कानून के असर से बच नहीं पाएंगी। जिस तरह स्मोकिंग का सीन आने पर- सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है-जैसी वैधानिक चेतावनी का स्टीकर लगाना जरूरी होता है, उसी तरह-हुजूर इस कदर यूं न इतरा के चलिए, कोई मनचला आ के पकड़ लेगा आंचल- जैसे गाने फिल्माए जाने के वक्त वैधानिक चेतावनी का स्टीकर लगाना होगा कि 16 साल से कम उम्र में छेड़खानी करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।