मंगलवार, 3 जुलाई 2012

कार और बेकार फिर चर्चा में


बात कुछ ऐसी है कि सत्तर के दशक में लौटते हैं। आम चुनाव सिर पर थे, मुकाबले में थीं इंदिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी और अटल, आडवानी और बलराज मधोक का भारतीय जनसंघ। चुनाव में कांग्रेस ने नारा उछाला-जनसंघ की क्या पहचान, बगल में छुरी मुंह में राम। पर इसके जवाब में आए नारे बेटा कार बनाता है, मां बेकार बनाती है ने कांग्रेस को बैकफुट पर ला दिया। दरअसल उस समय बेरोजगारी बड़ा मुद्दा बनकर उभरा था जबकि युवराज संजय गांधी मारूति कार बनाने की ठाने बैठे थे। नतीजे आए तो पता लगा कि मां-बेटे को यह नारा बहुत भारी पड़ा।
कार अब एक बार फिर चर्चा में है। देश के सबसे बड़े सूबे यूपी में भत्ता पा रहे हैं बेकार और माननीयों को मिल रही कार। यह अलग बात है कि इस बार बेकार और कार दोनों का ताल्लुक युवराज से है, मां राजनीति में कभी थीं नहीं और पिताश्री का इससे लेना देना नहीं।
धरतीपुत्र मुलायम सिंह यादव के पुत्र माननीय अखिलेश यादव को इस साल हुए यूपी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मीडिया और सपा कार्यकर्ताओं ने युवराज की पदवी से नवाजा। उन्हें कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी के मुकाबिल खड़ा किया गया। अखिलेश के लिए तो यह बहुत बड़ी बात थी, अलबत्ता कांग्रेसी युवराज यूपी तक ही सिमट कर रह गए। सारी ताकत झोंकने के बाद भी नतीजे उनके पक्ष में नहीं आए। जबकि उनके कद के हिसाब से यह बहुत छोटा चुनाव था। बड़बोलों की बोलती तो बंद हुई ही, युवराज को भी तब से ज्यादा बोलते नहीं देखा-सुना गया। जीत का सेहरा सपाई युवराज अखिलेश के सिर बंधा। वह महाराज बन गए। फिर चुनाव पूर्व किए गए अपने सभी वायदों पर उन्होंने अमल भी किया। उस वायदे पर भी, जिसमें कहा गया था कि सपा की सरकार बनी तो सूबे के बेकारों को बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा। भत्ता पाकर बेरोजगार निहाल हो गए। उन्होंने अब नौकरी भी तलाशना छोड़ दिया है। वैसे भी उन्हें जरूरत क्या है नौकरी की। जब घर बैठे ही पेंशन मिल रही हो, तो पसीना बहाने से क्या फायदा।
बेकारों के बाद युवराज से महाराज बने अखिलेश को ख्याल आया माननीयों का, सो उन पर मेहरबान हो गए। उन्होंने विधानसभा में ऐलान कर दिया कि सूबा भले ही वित्तीय संकट से जूझ रहा हो, पर जिन माननीयों के पास चार पहिया वाहन नहीं हैं, वे अपने लोकल एरिया डेवलपमेंट फंड से 20 लाख रुपये तक की कार खरीद सकते हैं। अब अगर, सीएम की घोषणा का लाभ उठाते हुए सभी माननीयों ने सचमुच अपने लिए कार खरीद लिया, तो सूबे के सरकारी खजाने को करीब 80 करोड़ रुपए का चूना लगेगा। कानून की बात करें तो उसके मुताबिक लोकल एरिया डेवलपमेंट फंड का इस्तेमाल सिर्फ इलाके के विकास के मद में ही किया जा सकता है। व्यक्तिगत लाभ के लिए तो उसका इस्तेमाल कतई नहीं होना चाहिए। पर राजा तो आखिर राजा ही होता है। हमने जिस देश के कानून की नकल की है, उसमें साफ-साफ लिखा है- किंग कैन डू नो रांग। यानी राजा तो गलती कर ही नहीं सकता है। ईश्वर आपकी प्रगति का मार्ग प्रशस्त करे राजा साहब।


सोमवार, 28 मई 2012

हाथ जले पर साइकिल चले

हाथ जले पर साइकिल चले
ओमकारा फिल्म का वह गाना याद होगा, बीड़ी जलइले... जिगर मे बड़ी आग है। बिपाशा बसु के जिगर की आग से बीड़ी जली या नहीं लेकिन पेट्रोल की कीमतों में लगी आग न केवल हाथ को झुलसा रही है, बल्कि लोगों के घर भी जला रही है। पर कहावत है कि किस्मत के खेल निराले। अब देखिए न। वही आग समाजवादी पार्टी के लिए बड़े काम की साबित हो रही है। बिना कुछ किए, किसी के चाहे-अनचाहे, उसकी रोटी सिक रही है। पेट्रोल की कीमतों की आग में समाजवादी पार्टी की साइकिल दमक रही है। हर छोटा-बड़ा आदमी साइकिल पर चलने की बात कर रहा है। और इस बार तो हद ही हो गई। पेट्रोल की कीमतों में अब तक की सबसे बड़ी बढ़ोतरी देखने के बाद जिगर में आग होने का दम भरने वाली बिपाशा बसु तक ने साइकिल से चलने का ऐलान कर दिया। कई और सिने तारिकाएं भी कुछ इसी तरह की बात कह रही हैं। 
कांग्रेस नीत यूपीए-2 सरकार के अब तक के तीन साल के कार्यकाल में पेट्रोल की कीमतें 16 बार बढ़ीं। 44 रुपये से कीमतें 75 के करीब पहुंच गईं। यह अपने आप में रिकार्ड है। पर जैसे-जैसे कीमतों में इजाफा होता गया, साइकिल की अहमियत बढ़ती गई। आकड़ों पर गौर करेंगे तो आप भी समझ जाएंगे। जरा तीन साल पहले की समाजवादी पार्टी और उसकी साइकिल की हालत पर गौर कीजिए। समाजवादी पार्टी के मुखिया, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री माननीय मुलायम सिंह यादव जी फिरोजाबाद संसदीय सीट से अपनी बहू डिंपल यादव तक को नहीं जितवा पाए थे, जबकि वह सीट वहां से सांसद और उनके बेटे अखिलेश यादव के इस्तीफा देने के बाद खाली हुई थी।
हम तो इसे पेट्रोल की कीमतों में उछाल का ही असर कहेंगे कि समाजवादी पार्टी ने अकेले अपने दम पर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई. सूबे को अखिलेश यादव जैसा युवा मुख्यमंत्री मिला। जबकि तीन साल की कौन कहे, छह महीने पहले भी कोई बहुत भरोसे से यह नहीं कह पा रहा था कि समाजवादी पार्टी बहन मायावाती की बहुजन समाज पार्टी को इस तरह चित करेगी. लेकिन पेट्रोल की बढ़ती कीमतें समाजवादी पार्टी के लिए धोबिया पाट दांव साबित हुईं। यह भी पेट्रोल की बढ़ती कीमतों का ही असर है कि कन्नौज सीट पर समाजवादी पार्टी की तरफ से डिंपल यादव के चुनाव लड़ने के ऐलान के साथ ही उनकी जीत के दावे शुरू हो गए हैं। इसे भी संयोग कहेंगे कि यह सीट भी उनके पति और सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के इस्तीफा देने के बाद ही रिक्त हुई है।
पिछले दिनों यूपीए के तीन साल पूरे होने के मौके पर जब प्रधानमंत्री ने रात्रिभोज का आयोजन किया तो उसमें मुलायम सिंह यादव को खास तवज्जो दी गई। वहां सोनिया गांधी ने जिस तरह से मुलायम सिंह यादव की मेहमाननवाजी की, उसके बाद से कयास लगाए जा रहे हैं कि संकट के दौर में मुलायम सिंह सरकार के सबसे बड़े संकटमोचक साबित हो सकते हैं। खबरें तो कुछ इसी तरह की आ रही हैं कि पिछले तीन सालों में ममता दीदी के तेवरों से यूपीए-2 सरकार तंग आ चुकी है। उनका रोज रोज लाल पीला होना, सड़क पर उतरना सत्तारूढ़ पार्टी को किसी भी कोने से सुहा नहीं रहा। कहा जाने लगा है कि सरकार और सरकार चलाने वाले उनसे पिंड छुड़ाना चाहते हैं। उन्हें यह मंजूर नहीं कि यूपीए का ही कोई घटक दल सरकार के फैसलों पर उंगली उठाए। और अगर वे ऐसा सोच पा रहे हैं, तो उसकी एकमात्र वजह समाजवादी पार्टी का दोस्ताना व्यवहार है। यानी साइकिल की अहमियत बढ़ रही है।
समाजवादी पार्टी को भी लगता है कि यूपीए-2 सरकार का कार्यकाल पूरा होने में अभी दो साल का समय है। इस दौरान अभी न जाने कितनी बार पेट्रोल की कीमतों में आग लगे। उसकी साइकिल की अहमियत तो बढ़ती ही जाएगी। यही सोचकर या यह कहें कि सरकार के बचे हुए दो साल का समाजवादी पार्टी पूरा फायदा उठाना चाहती है। उसने अपने पांव पसारने शुरू भी कर दिए हैं। विभिन्न राज्यों में दमदार मौजूदगी के लिए पार्टी कोई कोर कसर बाकी नहीं लगाना चाहती। उसे हर हाल में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा चाहिए. और इसके लिए उसकी सारी उम्मीदें पेट्रोल की कीमतों पर टिकी हुई हैं। अब कांग्रेस का हाथ जलता है तो जले, समाजवादी पार्टी की साइकिल तो चलेगी और खूब चलेगी। पेट्रोल की कृपा से मुलायम सिंह जी देश के अगले प्रधानमंत्री बन जाएं तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। पेट्रोल की आग भले ही मुझे भी जला रही हो, पर हम तो यही दुआ करेंगे कि मुलायम सिंह जी देश के प्रधानमंत्री बनें. वैसे भी सूबा उत्तर प्रदेश बहुत दिनों से अपने किसी नेता के इस पद तक पहुंचने का इंतजार कर रहा है।                     


मंगलवार, 20 सितंबर 2011

मोदी करे तो साला कैरेक्टर ढीला है.

सद्भावना मिशन के नाम पर तीन दिनों तक चले उपवास ने, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी या फिर भाजपा (जिस पार्टी से मोदी ताल्लुक रखते हैं) की सेहत पर कितना असर डाला यह तो बाद में पता लगेगा, पर इसमें कोई विवाद नहीं कि इसने, देश की सभी पार्टियों और उनके प्रमुख नेताओं को किसी न किसी तरह प्रभावित जरूर किया.
मोदी ने अपने उपवास को सद्भावना मिशन नाम दिया, पर ऐसे लोगों की तादाद कम नहीं है जिनके लिए वह नौटंकी, तमाशा या राजनीतिक शोशेबाजी से अधिक, कुछ नहीं था. कहा जा रहा है कि हाई प्रोफाइल उपवास के बहाने मोदी ने अपने पाप धोने की कोशिश की. 2002 में हुए गुजरात दंगों में उनकी भूमिका को देश का बुद्धिजीवी और प्रगतिशील तबका इसी नाम से पुकारता है. पर मेरे हिसाब से उपवास के बहाने, मोदी ने शुद्ध रूप से राजनीति की- उपवास की राजनीति. मोदी राजनेता हैं. उस लिहाज से राजनीति उनका धर्म-कर्म है, और होना भी चाहिए. इसमें बुराई कहां है? राजनेता अगर राजनीति नहीं करेगा तो और क्या सब्जी बेचेगा?
राजनीति में सब कुछ जायज माना जाता है. फिर चाहे वह परदे के पीछे हो या सरेआम. मोदी ने उपवास की राजनीति की. बाकायदा डुगडुगी पिटवाई, देश भर के अखबारों में विज्ञापन दिया और उस बहाने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचने में कामयाब रहे. कम से कम इसमें किसी को ऐतराज नहीं होगा कि लगातार तीन दिनों तक देश भर की मीडिया में वह छाए रहे. इसने साबित कर दिया कि आप मोदी को पसंद कर सकते हैं, उनसे नफरत कर सकते हैं, लेकिन उनकी अनदेखी नहीं कर सकते.
एक बात समझ में नहीं आई कि उपवास मोदी करने जा रहे थे, लेकिन दूसरों के पेट में ऐंठन क्यों हो रही थी? सबसे पहले मोदी के राजनीतिक गुरु से विरोधी बने शंकर सिंह बाघेला की बात करते हैं. मोदी के उपवास का ऐलान उन्हें हजम नहीं हुआ. सो उन्होंने उपवास का जवाब उपवास से ही देने का फैसला किया. यह तो अच्छा हुआ कि मोदी ने कोई और अनुष्ठान नहीं लिया था, वरना बाघेला साहब के लिए मुश्किल हो जाती. बहरहाल अपने उपवास की कामयाबी के लिए उन्होंने तंबू-कनात लगवाया, दंगा पीडि़तों की भीड़ जुटाई, हरेन पांड्या के परिजनों को बुलाया. इसके अलावा, और भी जो कुछ कर सकते थे, किया. क्या बाघेला साहब इस बात से इंकार कर सकते हैं कि यह सब राजनीति नहीं थी.
हालांकि बाघेला साहब को अब तक हिंदी की यह कहावत समझ में आ जानी चाहिए थी कि गुरु गुड़ ही रह गए, चेला शक्कर हो गया. सीधा-सा मतलब है कि उन्हीं से राजनीति का ककहरा सीखने वाला उनका शिष्य अब बहुत आगे निकल चुका है. अब उससे होड़ करने का कोई मतलब नहीं. मोदी को जहां देश भर में जाना-पहचाना जाता है, वहीं गुरुजी के सामने अपने गृह प्रदेश के बाहर पहचान के संकट से जूझने का खतरा है. गुजरात के बाहर और राजनीति में रुचि रखने वालों के अलावा कम ही लोग उन्हें जानते-पहचानते हैं. अगर मेरी बात पर यकीन नहीं तो खुद ही पता कर लीजिए.
मोदी के अनशन से सामाजिक कार्यकर्ता और मशहूर नृत्यांगना मल्लिका साराभाई का भी हाजमा खराब हो गया. मल्लिका जी, आप बेकार ही राजनीति में पांव पसार रही हैं. मैं तो कहूंगा, अभी भी मौका है, ज्यादा देर नहीं हुई है. उसी काम में मन लगाइए, जिसने आपको इतनी शोहरत दिलवाई. कम से कम उसमें कीचड़ लगने का तो खतरा नहीं है. वैसे आपका रिपोर्ट कार्ड यही बताता है कि राजनीतिक ता ता-थैया के लिए अभी और रियाज की जरूरत है. बहरहाल, अपने वकीलों को घूस देने का जो जुमला आपने उछाला है, वह पहली नजर में काफी बचकाना लगता है. अलबत्ता, इस बात के लिए आपको धन्यवाद दिया जाना चाहिए कि आपने अपने तई पूरी राजनीति करने की कोशिश की. अच्छा है, अनुभव काम आएगा.
अब जरा पार्टियों की बात करते हैं. तथाकथित सेकुलर पार्टियां तो भाजपा को सांप्रदायिक कहती ही हैं, देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी कांग्रेस भी इस मामले में पीछे नहीं रहना-दिखना चाहती. और बात जब भाजपा के सबसे सांप्रदायिक चेहरे यानी नरेंद्र मोदी की हो तो फिर भला कौन चुप रहता है. कांग्रेस को गुजरात दंगों के दर्द का तो अहसास है, लेकिन 1984 के सिख दंगों का भूत अब उसे परेशान नहीं करता. उसे उसने भूत यानी पास्ट मान लिया है. उसे गुजरात दंगों में मोदी की भूमिका तो नजर आती है, लेकिन सिख दंगों के लिए वह किसी कांग्रेसी नेता को जिम्मेदार मानने को तैयार नहीं. अब यह राजनीति नहीं तो और क्या है?
अब जरा गैर कांग्रेसी पार्टियों की बात करें. अन्नाद्रमुक सुप्रीमो जयललिता के अलावा, शिवसेना और शिरोमणि अकाली दल जैसे राजग के कई सहयोगी दल जहां मोदी के साथ कंधे से कंधा मिलाए खड़े दिखे, वहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जदयू के स्वनामधन्य नेता शरद यादव इस पूरे प्रकरण से किनारा किए हुए थे. उन्हें अपने वोट बैंक की चिंता सताए जा रही थी. लेकिन मोदी की उपवास की राजनीति का यही तकाजा था और सबने अपने अपने हिसाब से राजनीति की भी. फिर ऐसा क्यों कि कांग्रेस करे तो ठीक, नीतीश करें तो ठीक, बाघेला करें तो ठीक, मल्लिका करें तो ठीक, पर मोदी करे तो साला कैरेक्टर ढीला है.
(ब्‍लॉग में व्‍य‍क्‍त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, इनका द संडे इंडियन की संपादकीय नीति से कोई लेना-देना नहीं है)

गुरुवार, 16 जून 2011

बहुरेंगे कव्वाली के दिन!

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों को क्या हो गया है? कौन-सी बात हो गई कि उन्हें अपना सूबा रास नहीं आ रहा. जिसे देखो, वही यूपी की तरफ भाग रहा है. भागने वाली कहावत तो भइया किसी और ‘लिविंग थिंग’ से जुड़ी है. कहीं, महानुभावों को यूपी ‘शहर’ तो नहीं नजर आने लगा. जिसके पांव निकले, वह चाहे जहां बस गया, पर एमपी नहीं लौटा. पहले मोती लाल बोरा भागे, उत्तर प्रदेश की गवर्नरी की, महामहिम बने. अब दिल्ली में बैठ कर कांग्रेस का खजाना संभाल रहे हैं. एमपी की सियासत को अलविदा बोल दिया. उसके बाद बारी आई दिग्विजय सिंह की. वही, मीडिया में छाए रहने वाले दिग्गी राजा. आजकल कांग्रेस पार्टी में यूपी के प्रभारी महासचिव हैं. वहां कांग्रेस का ‘ठीहा’ मजबूत कर रहे हैं. कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्रियों को भागता देख भाजपा का बेचैन होना लाजिमी था. भगवा पार्टी सोचने लगी,जरूर कोई राज है, चलो पता करते हैं. कामयाबी नहीं मिली तो तय हुआ, आजमा कर देखेंगे. भेज दिया साध्वी उमा भारती को यूपी. वैसे भी बहुत दिनों से खाली बैठी थीं. कोई ‘एसाइनमेंट’ नहीं था. भरी सभा में आडवाणी जी का अपमान काफी भारी पड़ रहा था उन्हें. बहरहाल, अब ‘घरवापसी’ की औपचारिकता पूरी हो चुकी है.
हालांकि साधु-साध्वियों के लिए घर मायने नहीं रखता. महान संत कबीर दास तो पहले ही कह गए हैं, ‘कबिरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ, जे घर फूको आपनो, चले हमारे साथ.’ मतलब साफ है, न अपने घर की चिंता, न दूसरों के घर की. साध्वी से कहा गया कि यूपी में ‘पांचाली’ बनी पार्टी की लाज बचानी है. लालजी, कलराजजी, राजनाथजी, कटियारजी.... कल्याणजी को इसमें मत गिनिएगा, वह तो पहले ही तलाक दे चुके हैं.
साध्वी को फायर ब्रांड नेता माना जाता है. जिन लोगों को मुलायम राज में रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद आंदोलन की याद होगी, उन्हें पता है कि साध्वी को फायर से यू ही नहीं जोड़ा जाता. आप दीपा मेहता वाली ‘फायर’ के बारे में तो नहीं सोचने लगे. खैर, कहने का मतलब यह कि फायर से कैसे खेला जाता है, साध्वी अच्छी तरह जानती हैं. उस समय अगर यूपी के साथ-साथ सारा देश तपने लगा था, तो उसमें साध्वी का योगदान कम नहीं था. पर ऐसा लगता है कि 20 सालों में यूपी में भाजपा की आग ठंडी पड़ गई. विधानसभा चुनाव अगले साल होने है, पर अभी से कहा जा रहा है कि भाजपा को तीसरे या चौथे स्थान के लिए कोशिश करनी है. समीक्षकों, विश्लेषकों की इसी भविष्यवाणी के बाद शायद साध्वी को यूपी लाया गया है.
हालांकि दिग्गी राजा जिस तरह से ‘भड़काऊ बीज’ छींट रहे, उससे यही लगता है कि बाकी किसी के लिए कोई जगह बचेगी ही नहीं.  उन्हें और उनकी पार्टी को यकीन है कि फसल जरूर लहलहाएगी. इसीलिए वह कभी बटला हाउस मुठभेड़ को फर्जी बताते हैं, तो कभी लादेन को लादेनजी कह देते है. अचानक उन्हें चिंता सताने लगती है कि लादेनजी को इस तरह नहीं दफनाया जाना चाहिए था. कभी कहते हैं कि 26/11 के मुंबई हमले से पहले करकरे ने फोन कर बताया था कि उन्हें हिंदू आतंकवादियों से खतरा है. यानी क्या कहना है, इसका कभी ख्याल नहीं रहा. अब यह तो नहीं पता, कि जो कुछ कहते हैं, वह उनके ही दिमाग की उपज होती है, या फिर किसी की सलाह लेते हैं. संभव है किसी का हुक्म तामील करते हों. माहौल देखकर नहीं लगता कि उनके ‘जहर बुझे तीर’ कमाल कर पाएंगे.
साध्वी और दिग्गी राजा दोनों को अपनी-अपनी पार्टी के आलाकमान का आशीर्वाद हासिल है. साध्वी के लिए घर लौटना आसान नहीं था. उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी.  कई बार माहौल बना. लगा आज या कल घोषणा हो जाएगी. पर रास्ते में रोड़ा आ गया. सबसे ज्यादा विरोध तो उनके अपने सूबे वाले ही कर रहे थे. ये तो अच्छा था कि आलाकमान चाहते थे कि वह घर लौटें . हालांकि उन्हें भी अपने ‘सेनापतियों’ को मनाने-समझाने के लिए काफी पसीना बहाना पड़ा. दिग्गी राजा का हाल तो सभी जानते हैं. उन्हें पार्टी का ‘दूत’ कम युवराज का ‘अंबेसडर’ अधिक माना जाता है. कभी कभी तो वह ‘स्वयंभू प्रवक्ता’ की जिम्मेदारी भी संभाल लेते हैं. उन्हें लगता है कि युवराज को अगर देश की कुर्सी मिली, तो संभव है सूबा उत्तर प्रदेश उनके हवाले कर दिया जाए.
आजकल फिल्मों में कव्वाली कम ही देखने को मिलती है. नई पीढ़ी के लोग तो कव्वाली पसंद भी नहीं करते, लेकिन उम्रदराज लोगों खुश हैं. उन्हें लग रहा है कि साध्वी और दिग्गी राजा यूपी आ गए हैं तो ‘कव्वाली’ के दिन बहुरेंगे.

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

जात न पूछो..


जात न पूछो साधु की- वाली कहावत पुरानी हो चली है. अब तो भइया, -जात न पूछो मूर्तिवाले की. जिसकी मूर्ति बन गई, समझो जात-धर्म से ऊपर उठ गया. अब इसके बाद भी कोई जात की बात करता है, तो हो-हल्ला तो मचेगा ही.
राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह की मूर्ति देश में कई जगह लगी है. तीनों ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी. देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए फांसी के फंदे पर झूल गए थे. अब चूंकि देश में कांग्रेस नीत सरकार है, सो सत्तारूढ़ पार्टी को लगा कि उसे कुछ भी करने की आजादी है. बस उसने अपनी पत्रिका-कांग्रेस संदेश- में अपनी उसी आजादी का इस्तेमाल करते हुए आजादी के लिए शहीद हुए इन रणबांकुरों की जात का उल्लेख कर दिया. जोश में वह यह भूल गई कि जो मूर्तिमान हो गया, वह जात-पात से ऊपर उठ गया. उसकी जात का उल्लेख किसी भी हालत में नहीं करना है. उल्लेख मात्र से ही उनकी शहादत पर, उसकी उपलब्धियों पर, उसके योगदान पर धब्बा लग जाएगा. पर ऐसा हुआ, तो विपक्षी दल भाजपा को शोर मचाने का मौका मिल गया. कांग्रेस को सफाई देने के लिए बाकायदा महात्मा गांधी और मोतीलाल नेहरू तक को बीच में लाना पड़ा. उसे कहना पड़ा कि किताबों में गांधी जी को बनिया और मोतीलाल नेहरू को कश्मीरी ब्राह्मण बताया गया है.
हिसाब बराबर करने के लिए कांग्रेस बेचैन थी. उसको ज्यादा इंतजार भी नहीं करना पड़ा. भाजपा की चंड़ीगढ़ ईकाई की वेबसाइट पर देशरत्न, संविधान निर्माता, बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर को अस्पृश्य बताया गया था. बात यहीं तक रहती तब भी ठीक था. उसमें उनकी जात का भी उल्लेख था. हालांकि ऐसा केवल भाजपा की वेबसाइट में ही नहीं है. अयोध्या सिंह की बहुचर्चित पुस्तक- भारत का मुक्ति संग्राम- सहित तमाम किताबों मे बहुत साफ-साफ शब्दों में इस तथ्य का उल्लेख है. पर जो गलती कांग्रेस ने की थी, वही भाजपा ने भी कर दी थी. वह भूल गई कि बाबा साहेब मूर्तिमान हो चुके हैं. देश में जितनी संख्या में उनकी मूर्तियां लगी हैं, उतनी तो शायद किसी की भी नहीं. सो अबकी कांग्रेस ऊपर थी, भाजपा नीचे. मौके की नजाकत भांपते हुए भाजपा की चंडीगढ़ ईकाई ने आनन फानन में अपनी बेवसाइट से बाबा साहेब की जात वाला हिस्सा हटा दिया.
लेकिन भारत तो ऐसा देश है, जहां की राजनीति में हर बात जात से ही शुरू होती है, और जात पर ही खत्म होती है. और फिर ये तो राजनीति के शलाका पुरुष हैं. कभी कांग्रेस को ब्राह्मणों और भाजपा को (जनसंघ के जमाने से ही) बनियों की पार्टी माना जाता था. माननीय कांसीरामजी ने जात जो फार्मूला दिया, उसकी कामयाबी से भारतीय राजनीति के सारे समीकरण बदल गए. बहनजी भी सर्वसमाज की बात करती हों, पर उनके सर्वसमाज का मतलब क्या है, इसे सब जानते हैं. किस पार्टी का वोट बैंक कौन है, किसी को बताने की जरूरत नहीं है. दलितों के ये दोनों मसीहा मूर्तिमान हो चुके हैं. लखनऊ में बहनजी की आदमकद मूर्ति देखी जा सकती है. उम्मीद है, भविष्य में कम से कम वह गलती नहीं दुहराई जाएगी, जो इस मामले में कांग्रेस और भाजपा कर चुकी हैं.
भाई रामबिलास पासवानजी,  मुलायम सिंह यादवजी और लालू प्रसाद यादवजी ने भी जात के जादू से भारतीय राजनीति में नई इबारत लिखी. जब तक ये लोग मूर्तिमान नहीं हो जाते, तब तक, जो चाहे इनकी जात से खुद को जोड़ सकता है. अगर किसी समर्थक या चेले ने मूर्ति बनवा दी, तो फिर इनकी जात का जिक्र करना भी अपराध हो जाएगा. अगर आपमें से किसी को इनकी मूर्ति लगने की कोई जानकारी हो, तो उसे जरूर शेयर कीजिए. वरना न जाने कौन कब...

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

जीते अन्ना, हार गया भारत

अजीब संयोग है. आठ दिनों के भीतर ही दो बार जीत मिली. दोनों ही जीत का सबब बना महाराष्ट्र शनिवार, तारीख थी दो अप्रैल, 2011. दुनिया भर की नजरें मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम पर टिकी हुई थीं. हर कोई दिल थामकर बैठा था. जैसे जैसे रात गहरा रही थी, धड़कनें बढ़ती जा रही थीं. पर आधी रात से पहले अच्छी खबर आ गई. लोग जश्न मना रहे थे. भारत जीत गया था. श्रीलंका को हराकर विश्व विजेता बन गया था. शनिवार, तारीख नौ अप्रैल. पूरे आठ दिन बीत गए पर एक पल भी ऐसा नहीं हुआ, जब महाराष्ट्र चर्चा में न रहा हो. यह जरूर कह सकते हैं कि नायक बदल गए पर सेहरा बंधा मराठी मानुस के सिर ही. पिछले शनिवार अगर 37 के सचिन कंधे की सवारी कर रहे थे, तो अगले शनिवार को महफिल लूटी 73 के अन्ना हजारे ने. पहले शनिवार को अगर भारत जीता तो दूसरे शनिवार को अन्ना जीते.जीत के लिए सचिन को बधाई मिली थी, अन्ना भी बधाई के हकदार हैं. हैट्स आफ सचिन, अन्ना को गांधी टोपी मुबारक. आप गांधीजी के बताए रास्ते पर चलते हैं. अहिंसा और उपवास में आस्था है. दुनियाभर में लोग गांधवादी के तौर पर ही जानते-पहचानते हैं. गांधी खानदान के इशारों पर चलने वाली सरकार को हिलाने के लिए आप सरीखे महान गांधीवादी ने गांधीजी के उपवास वाले अस्त्र का सहारा लिया. कामयाब भी रहे. अब तो आपको आधुनिक गांधी बताया जा रहा है.भारत के इतिहास में थोडी़ भी रुचि रखने वालों ने 1922 के चौरी-चौरा कांड के बारे में जरूर सुना होगा. जिनकी रुचि बिल्कुल नही, उन्हें बता रहा हूं. अंग्रेजी जुल्म के खिलाफ पूरा देश असहयोग आंदोलन कर रहा था. लोगों का गुस्सा किस कदर उफान पर था, इसका अंदाजा इसी घटना के बाद लगा. पूर्वी उत्तर प्रदेश में चौरी चौरा नाम के छोटे से कस्बे में पुलिसवालों ने जब अंग्रेजों के खिलाफ नारेबाजी कर रहे ग्रामीणों को निशाना बनाया, तो भीड़ ने थाने में आग लगा दी. 22 पुलिसवालों की वहीं चिता बन गई. दूसरे दिन जब गांधीजी को इस घटना का पता लगा तो उन्होंने आनन फानन में असहयोग आंदोलन वापस लेने की घोषणा कर दी, जब उस समय वह आंदोलन पूरे ऊफान पर था. सारा देश हैरान. मोती लाल नेहरू, चितरंजन दास जैसे शीर्ष नेताओं को तो कुछ समझ में ही नहीं आया. देश दो राहे पर खड़ा हो गया. सबको पता है, भारत को आजादी के लिए पूरी चौथाई सदी का इंतजार करना पड़ा. अन्ना ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ा, जबकि वह तो कब का लोकाचार बन चुका है. सरकार यह बात अच्छी तरह जानती थी. सो उसे भ्रष्टाचार से कोई डर नहीं था. वह डर रही थी अन्ना से. उनके उपवास से. अन्ना को लग रहा था कि लोग उनके साथ खड़े हैं, जबकि लोग जुटे थे उस लोकाचार के विरोध में, जो अब अभिशाप का रूप लेता जा रहा है. देशभर में मोमबत्ती मार्च हो रहा था. क्या बूढ़ा, क्या जवान, क्या बच्चे, क्या महिलाएं. अभिशाप ने सबको परेशान कर रखा था. सबका गुस्सा बाहर आने को बेकरार था. ईमानदार छवि वाला कोई भी आगे आता, नायक बन जाता. शुक्रवार शाम से डील की सुगबुगाहट होने लगी. बताया जाने लगा कि सरकार ने अन्ना की सभी मांगे मान ली हैं. बस औपचारिक आदेश का इंतजार है. अगली सुबह आदेश आ गया. अच्छा हुआ कि छोटी सी बच्ची ने जूस पिलाकर अन्ना का उपवास खत्म कराया, वरना जिस तरह से टेलीकाम मंत्री कपिल सिब्बल सरकार की तरफ से मोर्चा संभाले हुए थे, उससे तो यही लग रहा था कि उपवास तोड़वाने की जिम्मेदारी भी उन्हें ही सौंपी जाएगी. यह वही कपिल सिब्बल हैं, जिन्हें पौने दो लाख करोड़ का टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला नजर ही नहीं आता, जबकि भारतीय इतिहास में इसे सबसे बड़ा घोटाला बताया जा रहा है. बात यहीं तक रहती तो भी ठीक था. यह विडंबना ही है कि भ्रष्टाचार की नकेल कसने के लिए प्रस्तावित लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने वाली साझा समिति में भी सिब्बल साहब को जगह दी गई. 90 साल बाद इतिहास ने खुद को दोहराया है. देश एक बार फिर दो राहे पर खड़ा है. उसने क्या सोचा था और क्या हासिल हुआ. हालांकि परेशान होने जैसी कोई बात नहीं है. कानून बन जाने से ही अगर अपराध खत्म हो जाते, तो फिर हत्या और बलात्कार जैसी जघन्य घटनाएं कब की इतिहास बन चुकी होतीं. देश को अभी और इंतजार करना होगा. संभव है कानून का कोई विकल्प आ जाए. अन्ना आप जीत गए. सरकार भी जीत का दावा कर रही है, पर भारत हार गया

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

पटरी नहीं दिलाती मंजिल

रेल की पटरी मंजिल तक पहुंचा देती है. यह सत्य है. लेकिन यह आप पर है कि इसे अर्ध सत्य समझते हैं या पूर्ण सत्य. मैं तो इसे अर्ध सत्य मानता हूं. अलबत्ता, ऐसे लोगों की तादाद बहुत बड़ी है, जो इसे पूर्ण सत्य मानते हैं. अखबारों में ऐसी खबरें महीने में एक-दो बार पढ़ने को जरूर मिल जाती हैं कि पूरे परिवार ने रेल की पटरी पर जान दे दी. विवाहिता या फिर किसी युवक का शव पटरी पर पड़ा मिला. वे जान देने आए थे, जान दे दी. उन्हें मंजिल मिल गई.

एक पहेली बचपन से सुन रहा हूं.लोग पूछते हैं पहले मुर्गी आई या अंडा. कोई कहता है पहले मुर्गी आई तब अंडा, कोई कहता है पहले अंडा आया, मुर्गी उसी में से निकली. अब यह न पूछिएगा कि इस पहेली का यहां क्या मतलब है. वैसे, मैं बताए दे रहा हूं. यह कोई पहेली नहीं कि रेल की पटरी पहले आई या ट्रेन. निश्चित तौर पर पहले ट्रेन आई और उससे भी पहले आया इंजन. भाप की ताकत पहचानी जेम्स वाट ने, स्टीवेंसन ने बनाया इंजन. पटरी का नंबर तो सबसे बाद में आया. मंजिल दिल्ली हो या कोलकाता. मुंबई हो या गोरखपुर ट्रेन पहुंचा देती है.

पिछली सदी के आखिरी दशक में बोतल से दो जिन्न निकले थे. पहले को जितने लोगों को लीलना था, लील कर खामोश हो गया, बचा रह गया दूसरा. जो आग तब उसके मुंह से निकली थी, वह रह-रह कर जब-तब भड़कती रहती है. कोई भरोसा नहीं कि किसको लील लेगी. सरकार रेवड़ी बांटकर आग बुझाने की कोशिश करती है. जिसको मिल जाता है, वह शांत हो जाता है, जिसे नहीं मिलता, वह जीना हराम कर देता है. बुरा हो सरकारी रेवड़ी का. उसने ऐसी आदत खराब की कि गाहे-बगाहे लोगों की उसके लिए लार टपकने लगती है. हर कोई चाहता है कि रेवड़ी उसे भी मिल जाए.

बात यहीं तक रहती तो ठीक था, पर रेवड़ी को तो हक मान लिया गया, इससे किसी को इंकार नहीं कि हक मांगना चाहिए. आसानी से न मिले तो छीन भी लेना चाहिए, लेकिन दूसरों का सुख चैन छीनने का हक तो किसी को नहीं.

रेवड़ी के लिए 20 साल पहले जो आपाधापी शुरू हुई थी, उसका सिलसिला थमा नहीं है. दो साल पहले राजस्थान का आंदोलन भूला नहीं होगा. लोगों का आना-जाना मुहाल हो गया था. रेल लाइनें ठिकाना बन गई थीं. अब किसी को दिक्तत हुई हो, तो हो. उनकी बला से. उन्हें क्या, उन्हें तो बस हक चाहिए था.

याद कीजिए.पिछले साल दिसंबर का आखिरी हफ्ता. कितने ही लोगों का गांव-घर जाकर सर्दियों की छुट्टी मनाने का सपना, सपना ही रह गया. कोई नए साल के जश्न में शामिल नहीं हो पाया, तो कोई इलाज के लिए दिल्ली-मुंबई के बड़े अस्पतालों तक नहीं पहुंच पाया. न जाने कितने लोगों ने दम तोड़ दिया. इसके अलावा न जाने किसके-किसके क्या-क्या जरूरी काम रह गए, इसका कोई हिसाब नहीं है. कई दौर की वार्ता के बाद ही रेल की पटरियां खाली हो सकी थीं.

पर यह क्या.अभी दो महीने बीते ही थे कि अचानक काफूरगंज सुर्खियों में आ गया और सबका सुखचैन काफूर कर गया. रेल की पटरियां फिर बन गईं ठिकाना. दादी-ताई तो वहीं चूल्हा चौका ले आईं. पटरी पर रोटियां सिंकते तो टीवी पर देखा ही होगा. दादा, ताऊ वहीं गुड़गुड़े खींचने लगे. वहीं लग गई चौपाल. वहीं बैठे-बैठे दिल्ली का हुक्का- पानी बंद करने की धमकी दी जाने लगी.

सरकार कान में तेल डालकर बैठी थी. लोगों का तेल निकला जा रहा था. 13 दिनों तक रेल की पटरी बंधक बनी रही. अच्छा हुआ कि हाईकोर्ट बीच में आ गया, और लट्ठ पर डंडा भारी पड़ा. हम अदालती डंडे की बात कर रहे हैं. वह पुरानी कहावत तो सुनी ही होगी. वही तेरहवीं वाली. अदालत को शायद वह याद आ गई थी, सो उसने तेरहवें दिन तेरहवीं करा दी. अगले कुछेक घंटों में रेल की पटरी आजाद हो गई.

यह बात अच्छी तरह समझ ली जानी चाहिए कि लोग जिसे पूर्ण सत्य समझ रहे हैं, वह अर्ध सत्य है. पूर्ण सत्य यह है कि पटरी पर बैठने-लेटने या चलने से मंजिल नहीं मिलती. रेल की पटरी, ट्रेन के चलने के लिए बनी है. और ट्रेनें ही मंजिल तक पहुंचाती हैं. जब तक ट्रेन नहीं होगी, तब तक मंजिल नहीं मिलेगी. इसलिए बेहतर है, वह ट्रेन तलाशी जाए, जो मंजिल तक पहुंचा सके. पटरी पर सोने, जागने से लोग सिर्फ परेशान होंगे. बाकी किसी को कुछ नहीं हासिल होने वाला.