सोमवार, 17 जनवरी 2011

यूपीए-2 को लूट लेगा पी-2!

हमें तो लूट लिया मिल के हुस्न वालों ने...'  क्या लूट थी वो लूट, बजाए आंसू बहाने के, अफसोस जताने के, लुटने वाले खुश कि किसी ने लूटा तो सही. इस गाने ने शिल्पा शेट्टी को शायद बहुत हिम्मत दी, तभी तो चली आईं थीं खुले आम, यूपी, बिहार लूटने. सिपहसालारों को लगा-जब लुटने, लुटाने और लूटने का खेल इतना निराला है तो क्यों ने चलकर सरकारजी को सुझाया जाए.शिल्पा लूट सकती हैं, तो सरकार क्यों नहीं. चले गए सरकार बहादुर के पास-हुजूर, कितना अच्छा हो, सरकार खुद लूटे. ऐसा संभव नहीं तो लूट का लाइसेंस जारी करे. आइडिया अप्रूव. फटाफट आदेश तामिल हो गया. लाइसेंस लीजिए, खुलकर लूटिए. इतना बड़ा देश. इतनी ज्यादा आबादी. इतना बड़ा बाजार. इतने ज्यादा खरीदार. यानी इतने ज्यादा लुटने वाले. लूटने वाले तो जोड़-घटाना करते रहते हैं, उन्हें अपने संभावित बाजार-खरीदार का पता होता है. आदेश निकलते ही लाइसेंस लेने की होड़ मच गई. बच्चा बच्चा राम का, जन्म भूमि के काम का की तरह हर एक को पता लग गया कि पैसे दे दो, लाइसेंस ले लो. जगह जगह साइन बोर्ड लग गए-यहां लाइसेंस बनता है. यह बात दीगर है कि आरटीओ आफिस (रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिस) के सामने शायद ही कहीं लिखा हो, यहां ड्राइविंग लाइसेंस बनता है. बंदूक का लाइसेंस कहां बनता है, यह भी कम लोगों को मालूम होगा. बेशक चंबल वाले जानते हैं. लेकिन बंदूक किस काम की. लूट में उसका क्या काम? लूट के लिए कोई लाइसेंसी बंदूक का इस्तेमाल थोड़े ही करता है. और यहां तो लूट का ही लाइसेंस मिल रहा है.

ट्रकों की तरह जमाखोर और कालाबाजारिए पीछे लिखवा रहे हैं - बुरी नजर वालों तेरा मुंह काला. बेचारों को कोई अच्छी नजर से नहीं देखता. भाई लोगों ने खूब लूट मचाई. लूट का लाइसेंस सबसे पहले इन्हें मिला तो बाजी कौन मारता. पहले चीटियों की तरह चीनी की मिठास चाट गए. फिर धीरे-धीरे गेहूं, चावल, तेल सबको इनकी नजर लग गई. कोई झाड़-फूंक काम नहीं आई. ओझा-सोखा सब बेकार. बाजार के जानकारों को पता था कि देश की बहुत बड़ी आबादी गरीब है. वह रोटी-नमक-प्याज से काम चला लेती है. रोटी यानी गेहूं पर तो पहले ही नजर पड़ गई थी. बचे थे केवल नमक- प्याज.  नमक पर निशाना साधने में खतरा था. कोई गांधी कहीं नमक बनाने फिर से डांडी चला गया, तब क्या होगा? सो सबसे मुफीद लगा प्याज. देखते ही देखते आसमान छूने लगी प्याज और आंसू बहाने लगी जनता. पर इन्हें क्या? लाइसेंस लिया है लूटने का.

लाइसेंस मिल रहा था तो तेल कंपनियां भला क्यों पीछे रहतीं. सरकार को भी लगा-लूट का लाइसेंस देकर बचा जा सकता है. जनता कोसेगी तो नहीं. फटाफट लाइसेंस दे दिया. फिर क्या था. लाइसेंस आया हाथ, अब डर काहे का. महंगाई की आग में झुलस ही रही जनता पर पेट्रोल छिडक़ दिया. 48 से 58 तक पहुंचने में महज सात महीने लगे. पिछले साल जून में साढ़े तीन रुपये की बढ़ोत्तरी से शुरु हुआ सफर, दिसंबर में दो रुपये 96 पैसे की बढ़ोत्तरी के साथ खत्म हुआ. हां, भई 2010. नया साल- नया सफर. 2011 में जैसे मकर संक्रांति का इंतजार रहा हो. वैसे भी देश के अधिकतर हिस्सों में मकर संक्रांति से एक महीने पहले का समय अच्छा नहीं माना जाता. मकर संक्रांति में सूर्य देव की पूजा होती है, कंपनियों ने आग लगाने के लिए शायद इसीलिए अंधेरा होने का इंतजार किया. ज्यादातर लोगों को तो सुबह अखबार पढक़र मालूम हुआ कि आग लग गई है. 
हवाई जहाजों में भीड़ देखकर तेल कंपनियों को अंदाजा हो गया था कि अमीरों की तादाद लगातार बढ़ रही है. हवाई जहाज तो हवा में आसमान में उड़ते ही हैं, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी की आड़ लेकर उन्होंने एटीएफ की कीमतों को भी आसमान की सैर करा दी. अरे पटेल साहेब, जरा पता कराइए. कोई साजिश तो नहीं हो रही आपकी पार्टी के खिलाफ, आपने विमानन मंत्रालय संभाला तो एटीएफ (विमान का ईंधन) महंगा हो गया. और चीनी से लेकर प्याज तक कोई भी चीज महंगी हुई तो आपकी पार्टी के मुखिया पवार साहेबका नाम आ जाता है. वैसे भी युवराज का बयान तो आपको याद ही होगा.
हेरोडेटस को इतिहास का जनक (फादर ऑफ हिस्ट्री) कहा जाता है. उन्होंने इतिहास के बारे में एक टिप्पणी की थी. इतिहास का एकमात्र सबक यही है कि हम इतिहास से कोई सबक नहीं लेते. (द ओनली लेसन ऑफ हिस्ट्री इज दैट, वी डू नाट टेक एनी लेसन फ्राम हिस्ट्री). लगता है सरकार ने हेरोडेटस की यह टिप्पणी गांठ बांध ली है. उसे पिछले दशक के आखिरी दिनों में दिल्ली की सुषमा स्वराज सरकार का पतन याद नहीं है. सरकारों की बलि लेने का प्याज का पुराना इतिहास रहा है. अब तो प्याज और पेट्रोल मिलकर पी-2 बन गए हैं. यूपीए-2 नहीं चेता तो पी-2 उसे भी लूट लेगा.

1 टिप्पणी:

  1. पी टू को लेकर आपका विश्लेषण अच्छा है। चौहदी में कई और सारी बातें भी आई हैं। आलेख के अंत तक आते-आते पता चलता है कि पीटू का मायने प्याज और पेट्रोल है।

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