गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

दस का दम

वाकई दस बहुत दमदार था. बहुत जान थी दस में. कोई ऐसा नहीं था जिसकी आंख से आंसू न निकले हों. खून के आंसू से बात शुरू करते हैं. महामंदी आई तो महंगाई भला कैसे नहीं आती. हालांकि 2009 खत्म होते-होते लग रहा था कि मंदी मंद पड़ जाएगी. हुआ भी ऐसा, पर मंहगाई ने मार ही डाला. उस पर किसी का जोर नहीं चला. सारे धुरंधर अर्थशास्त्री मसलन-मसि साहेब, मोसि साहेब-सब फे ल हो गए. मसि साहेब तारीख पर तारीख देते रहे. कभी कहा कि फलां तारीख तक महंगाई से राहत मिल जाएगी, तो कभी यह कि फलां तारीख तक महंगाई पर काबू पा लिया जाएगा.
मोंटेक सिंह अहलूवालिया

मनमोहन सिंह

मोसि साहेब तो और भी बीस साबित हुए. पंजाब विश्वविद्यालय गए थे इकोनॉमिक एसोसिएशन के सेमिनार में. अपने विद्वतापूर्ण समापन भाषण में बोले-पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य में बढ़ोत्तरी जरूरी है. बकौल उनके, 'अगर हम ऐसा करेंगे तो पेट्रोलियम पदार्थों का प्रयोग घट जाएगा. ऊर्जा के संसाधनों की बर्बादी रुक जाएगी.' मोसि साहेब, आप वाकई धन्यवाद के पात्र हैं, काबिले-तारीफ हैं. आपने तो एक ही 'सूत्र वाक्य' में मंहगाई का हल निकाल दिया. यानी अनाज, सब्जी, दूध के दाम और बढ़ा दो. ऐसा हुआ तो इनका इस्तेमाल घट जाएगा. बर्बादी भी रुकेगी. 'गूदा' खाने वालों की तो नहीं जानते, लेकिन 'गूठली'  चूसने वाला आम आदमी इतना जानता है कि पेट्रोल, डीजल के दाम बढ़ेंगे, तो अनाज, सब्जी, दूध से लेकर हर चीज महंगी हो जाएगी. मोसि साहेब, अब यह तो आप ही जानते होंगे कि इससे महंगाई के जख्म पर मरहम लगेगा या नमक.

सचमुच अर्थशास्त्र समझना आसान नहीं है. उसे समझने के लिए अर्थशास्त्री होना जरूरी है. जब यूपीए-2 सत्ता में आई, कहा जा रहा था कि सरकार में तीन-तीन महान अर्थशास्त्री हैं. हां भई, चि साहेब को तो हम भूल ही गए थे, वह भी अर्थशास्त्री रहे हैं. अलबत्ता इधर, उन्हें 'गृह' में उलझा दिया गया है. देख लिया न चि साहेब, क्या हालत होती है? शायद इसीलिए कहा गया है कि घर की मुर्गी साग बराबर. आपकी हालत का अंदाजा तो उसी दिन हो गया, जिस दिन आपको आपके ही महकमे के एक अदने से मुलाजिम ने नसीहत दे डाली. भला हो, महाराष्ट्र के माननीय मुख्यमंत्री जी का, जो गढ़चिरौली के डिप्टी कलेक्टर पर कार्रवाई करने जा रहे हैं. वैसे भी उस अदने से मुलाजिम ने आइना दिखाने का बहुत भारी जुर्म किया है.

लेकिन इस घर का क्या किया जाए जहां, साग भी मुर्गी से आगे निकल गया. चलिए वजीरे फाइनेंस की बात करते हैं. महंगाई का वैसे भी सीधा उन्हीं के महकमे से नाता है. प्रदा को तो हर फन का उस्ताद माना जाता है. सरकार हो या सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस दोनों उन्हें संकटमोचक मानते हैं. संकट कैसा भी हो, प्रदा उससे निजात दिला ही देते हैं. अभी तक का इतिहास तो यही बताता है. महंगाई के मामले में भी उनसे बहुत उम्मीद थी, पर या तो प्रदा ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, या फिर तमाम दूसरे संकटों से जूझते-जूझते उनके हाथ इतने चिकने हो गए कि महंगाई बार-बार फिसल जा रही है.

अनुषाजी ने दस का दम दिखाने के लिए पीपली लाइव बनाई. गाना डाला-सखी सैयां तो खूबै कमात है, महंगाई डायन खाए जात है. अनुषा जी, ऐसा ही रहा तो जल्द ही आपको एक फिल्म और बनानी पड़ेगी-पीपुल डेड. इससे पहले कि महंगाई डायन सबको खा जाए, बताइए कि महंगाई डायन को कौन खाएगा. लोग इंतजार कर रहे हैं. अब तो आप जैसे लोगों में ही उम्मीद की किरण नजर आती है.

दस तो जैसे दम दिखाने के लिए ही आया था. सरकार का यह हाल है तो सरकारी एजेंसियां भला कहां पीछे रहने वाली हैं.  अपनी सीबीआई को ही देखिए. अभी तक तो उसके एब्रीबिएशन को लोग अपनी-अपनी तरह से परिभाषित करते थे. कोई उसे कांग्रेस से जोड़ता था, तो कोई करप्शन से. कोई किसी से प्रभावित होने का आरोप लगाता था, कोई किसी से, पर यह क्या, इस साल तो वह एक फिल्म की टाइटल से ही प्रभावित हो गई लगती है. 'नो वन किल्ड जेसिका' अभी रिलीज नहीं हुई है, टीवी पर सिर्फ प्रोमोज चल रहे हैं, पर सीबीआई ने मई, 2008 में राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा में हुए आरुषि मर्डर केस को बंद कर एक नई फिल्म-'नो वन किल्ड आरुषि' की पटकथा लिख दी. अब तलवार दंपति के आंसू न सूख रहे हों, तो उसके लिए सीबीआई क्या करे.

वैसे बात सिर्फ तलवार दंपति की ही नहीं है. हिंदुस्तान में ऐसे सैंकड़ों-हजारों मां-बाप, भाई-बहन हैं, जिनकी आंखों से लगातार आंसू निकल रहे हैं. उन सबके किसी न किसी परिजन की हत्या हो गई और हत्यारे का कोई सुराग नहीं मिला. चूंकि उनका मामला हाई प्रोफाइल नहीं था, चर्चा में नहीं आया, जांच के लिए सीबीआई के पास नहीं पहुंचा, सो किसी को पता भी नहीं लगा.

चलो, सबका दम निकाल देने वाले दस का आखिर दम तो निकला. अब नया साल, नई उम्मीदें. 1-1-11 करेंगे, मुसीबतों, मुश्किलों, महंगाई, मर्डर, मिस्ट्री को 9-2-11 कहेंगे.

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छा सर नौ दो ग्यारह करने के लिए विषय अच्छे चुने हैं या फिर 12 में बारहवीं का इंतजार करना होगा ये तो साल के अंत में ही पता चल पाएगा... घर की मुर्गी को दाल के बराबर न कर आपने एक अच्छा मुहावरा दे दिया घर की मुर्गी साल बराबर... क्योंकि दाल तो खुद ही महंगी हो कर स्पेशल डिश में शामिल हो चुकी है

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  2. करेक्शन... घर की मुर्गी साग बराबर पढ़ें

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