शुक्रवार, 15 मार्च 2013

14 तारीख, 15वां जलसा, 16 की सौगात

कल यानी 14 मार्च को श्रीमती सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष का पद भार संभाले 15 साल हो गए । जश्न के इस मौके पर कांग्रेस नीत यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलाएंस (यूपीए) सरकार के मंत्रियों ने 16 साल में सहमति से सेक्स के हक के एलान के रूप में एक तीर से दो निशाने किए। एक तरफ तो देश को नायाब तोहफा देने का प्रहसन हुआ और दूसरी तरफ यथा नाम तथा गुण की प्रासंगिकता साबित करने का ढोंग कि यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलाएंस वास्तव में प्रोग्रेसिव है। कैबिनेट का यह फैसला अगर कानून की शक्ल लेता है तो फिर 16 साल की उम्र में सहमति से सेक्स को जायज माना जाएगा। 16 बरस की बाली उमर को सलाम।
कैबिनेट का यह अहम फैसला इसलिए काबिले तारीफ है, क्योंकि कैबिनेट ने सहमति से सेक्स की उम्र 16 साल करने पर सहमति बनाने में जरा भी देर नहीं लगाई। यह अलग बात है कि केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ सहमति से सेक्स की उम्र 18 साल ही रहने देने पर अड़ी हुई थीं। बुरा हो 16 दिसंबर की उस काली रात का, जिसकी वजह से यूपीए कैबिनेट को इतने अहम फैसले पर आनन फानन में मुहर लगानी पड़ी। बुरा इसलिए, क्योंकि देश को शर्मसार करने वाली उस रात की अभागी घटना के बाद से अखबारों के पन्ने बलात्कार की घटनाओं से अटे पड़े हैं। लग रहा है जैसे उस घटना ने उत्प्रेरक यानी कैटेलेटिक एजेंट का काम किया हो। क्या स्कली बच्चियां, क्या नवयौवनाएं, अब तो दादी-नानी की उम्र वाली भी बलात्कारियों का निवाला बन रही हैं।
कैबिनेट का तर्क है कि आज के परिवेश में बच्चे कम उम्र में ही समझदार हो जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि सेक्स एजूकेशन और इंटरनेट की एक्सेसिबिलिटी से 16 साल की उम्र में ही बच्चों में अच्छे-बुरे का फर्क समझने की काबिलियत आ जा रही है। अब चूंकि देश में मैरेज एजूकेशन स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है, इसलिए शादी की उम्र 18 साल रहेगी, क्योंकि बकौल सरकार उसके लिए समझदारी 18 की उम्र में ही आ सकती है। यानी सहमति से सेक्स करते रहिए, लेकिन शादी की तय उम्र जस की तस रहेगी। कैरीकुलम का हिस्सा नहीं होने की वजह से वोटिंग राइट भी 18 साल में ही मिलेगा। ड्राइविंग भी स्कूलों में नहीं पढ़ाई जाती, सो ड्राइविंग लाइसेंस के लिए 18 साल के होने का इंतजार करना पड़ेगा। तो क्या मान लिया जाए कि कल को जब देश में साइबर लिटरेसी और बढेगी, तो सहमति से सेक्स की उम्र सीमा 12 साल हो जाएगी। सच कहूं तो 14 मार्च को हुए इस अहम फैसले के बाद यह तय करना मुश्किल हो गया है कि यूपीए सरकार के राज में देश वास्तव में प्रोग्रेस कर रहा है या हम उस जमाने में लौट रहे हैं, जब बाल विवाह प्रचलन में था।
कैबिनेट ने अपने फैसले में कहा है कि महिलाओं को घूरना या उनका पीछा करना भी गैर जमानती अपराध माना जाएगा। यानी कानून बनने के बाद अगर किसी महिला ने झूठा आरोप लगा दिया तो भी सजा भुगतने के लिए तैयार रहिए। बलात्कार की स्थिति में तो मेडिकल जांच से पीड़िता के आरोपों की पुष्टि हो जाती है, लेकिन घूरने या पीछा करने के आरोप की पुष्टि के लिए सरकार कौन सा टेस्ट या तरीका इजाद करेगी, इसका बेसब्री से इंतजार है। दहेज उत्पीड़न कानून का किस तरह दुरुपयोग हुआ यह बताने की जरूरत नहीं है। अगर घूरना या पीछा करना गैर जमानती अपराध बना तो वह पड़ोसी मुल्क के ईश निंदा कानून (ब्लैसफैमी) की तरह ही होगा, जिसमें किसी तरह के सबूत की जरूरत नहीं होती। इस काले कानून की वजह से हाल में लाहौर के बादामी बाग इलाके में ईसाइयों के 150 से ज्यादा घर जला दिए गए।
दरअसल हुआ यह कि वहां कच्ची शराब का धंधा करने वाले मसीह और इमरान नाम के दो दोस्त रोज शाम को साथ बैठकर दारू पीते थे। एक दिन पीने के दौरान दोनों में किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया। मसीह को भारी पड़ता देख इमरान ने शोर मचा दिया कि वह पैंगबर मोहम्मद साहब को बुरा भला कह रहा है। बस देखते ही देखते हजारों लोग जमा हो गए। पूरे इलाके में दंगा हो गया और सैकड़ों घर आग के हवाले। किसी के पास इस बात का सबूत नहीं था कि मसीह ने दरअसल कहा क्या है। किसी ने यह जानने की जहमत भी नहीं उठाई कि जब इस्लाम में दारू पीना, बनाना या बेचना हराम है तो फिर इमरान किस हक से इस काम को बेखौफ होकर अंजाम दे रहा था। इससे पहले ब्लैसफैमी का इल्जाम लगाकर वहां एक गवर्नर को सरेआम कत्ल करने की घटना अभी भूली नहीं है।
वह दिन दूर नहीं जब फिल्में भी इस कानून के असर से बच नहीं पाएंगी। जिस तरह स्मोकिंग का सीन आने पर- सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है-जैसी वैधानिक चेतावनी का स्टीकर लगाना जरूरी होता है, उसी तरह-हुजूर इस कदर यूं न इतरा के चलिए, कोई मनचला आ के पकड़ लेगा आंचल- जैसे गाने फिल्माए जाने के वक्त वैधानिक चेतावनी का स्टीकर लगाना होगा कि 16 साल से कम उम्र में छेड़खानी करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।   

बुधवार, 23 जनवरी 2013

धर्म न पूछो दिग्गी का



जात न पूछो साधु की, यह कहावत तो मैंने बचपन में ही सुन ली थी, अब जबकि जवानी भी पीछे छूटती जा रही है, तब एक नई कहावत सुन रहा हूं, धर्म न पूछो दिग्गी का। दिग्गी तो आप समझ ही गए होंगे। वही कांग्रेस के दिग्विजय सिंह। राजा। राजाओं का वैसे भी कोई धर्म नहीं होता। न हिंदू, न मुस्लिम, न सिख न ईसाई, न यहूदी और न... । उन्हें बस राजधर्म निभाने की सीख दी जाती थी। राजधर्म से सभी राजा बंधे होते थे। पर जमाना बदला, तो राजधर्म के मायने भी बदल गए। अब हर राजा राजधर्म की अपने हिसाब से व्याख्या करता है। सीधे शब्दों में कहें तो राजधर्म के मामले में सहूलियत का समाजशास्त्र लागू होता है। जिसे जैसे सहूलियत हुई, उसने उसी हिसाब से राजधर्म तय कर लिया।
दिग्गी राजा पर लौटते हैं। लेकिन लौटने के लिए फिर एक पुरानी कहावत को सीढ़ी के तौर पर इस्तेमाल कर रहा हूं। कहा जाता है, रस्सी जल गई, ऐंठ न गई। रियासतें तो देश की आजादी के साथ ही खत्म हो गई थीं। बची खुची शान इंदिरा गांधी के जमाने में प्रिवी पर्स के खात्मे के साथ चमक खो बैठी। लेकिन शायद, दिग्गी की तरह कई राजा किस्मत वाले थे, जिन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर एक बार फिर से राज करने का मौका मिला। सूबा मध्य प्रदेश निहाल हो गया, दिग्गी जैसा राजा पाकर। पर लोकतंत्र के जमाने में शासक वही होता है, जिसके पास जनादेश होता है। जनता जिसे चाहती है, उसे अपना राजा मानती है। जिससे मन भर गया, उसे कुर्सी से उतार दिया।
दिग्गी राजा की सूबेदारी चली गई, तो उन्होंने युवराज के यहां डेरा डाल दिया। अपने बड़बोलेपन से बहुत कम समय में दरबार में खासा दबदबा कायम करने में भी कामयाब रहे। सूबा-सूबा घूमने लगे। अब तो आलम यह है कि कुछ दिन शांत रहें, तो लोगों को बेचैनी होने लगती है। लोग सोचने लगते हैं, बोलने वाले राजा साहेब, चुप क्यों बैठे हैं। हालांकि जल्द ही अपनी चुप्पी तोड़कर राजा साहेब अपनी मौजूदगी का अहसास करा देते हैं। उन्हें अपना राजधर्म याद आ जाता है। दुनिया जिसे आतंकी नंबर एक मानती थी, उसकी मौत के बाद, राजा साहेब उसे ओसामाजी पुकारने लगे। फिर उन्हें लगा कि यह काम तो ओसामा के जिंदा रहते करना चाहिए था। सो अभी हाल में अपनी साहेब की पदवी से मोस्ट वांडेड हाफिज सईद को नवाज कर उन्होंने अपनी गलती सुधार ली।
आतंकियों को भी लगता होगा, कोई तो है, जो उन्हें सम्मान भरी नजरों से देखता है। उनके लिए जी और साहेब जैसे संबोधन का इस्तेमाल करता है। वैसे भी राजा के कद्रदानों की कमी नहीं है। राजा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि साहेब तो हाफिज सईद के साथ चला गया। अब सिर्फ राजा ही कहना पड़ेगा, बेशक उनके पास न सूबा है, न रियासत। बोलते रहिए, राजा, सियासत का यही तकाजा है।   

                                 

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

हम हिंदी वाले हैं ही ऐसे


आज हिंदी दिवस है। स्वतंत्रता दिवस अभी दो महीने पहले ही बीता है और गणतंत्र दिवस आने में तीन-चार महीने की देरी है। आप सोच रहे होंगे कि हिंदी दिवस से बात शुरू हुई थी, ये स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस बीच में कहां से आ गए। दरअसल, अपने हिंदुस्तान में जिसको विशिष्ट सम्मान देना हो, जिसे श्रद्धासुमन अर्पित करने हों, उसका दिवस मनवा देने की परंपरा है। कैसी स्वतंत्रता और कैसा लोकतंत्र, यह तो आप जानते ही हैं, अपनी हिंदी का भी कुछ वैसा ही हाल है। जहां आजादी से दम घुटता हो, लोकतंत्र के मंदिरों की कार्यवाही शर्मसार करती हो, वहां हिंदी कैसे हिंदुस्तान के माथे की बिंदी हो सकती है। हिंदी हमें शर्मसार करती है और लोगों को हमपर हंसने का अवसर भी मुहैया कराती है। लोग हंसे भी क्यों न, हम हिंदी वाले हैं ही ऐसे।
हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर हम ऐसी ही एक घटना के साक्षी बने। शाम के करीब साढ़े छह बज रहे थे। करीब 10-12 हिंदी भाषी सहकर्मियों की उपस्थिति में एक देवी का प्रवेश हुआ। परिचय देने के क्रम में उन्होंने जो पहला वाक्य बोला, उससे लगा कि वह देशज हैं, देसवाली है, घर की हैं। अपनी माटी की खुशबू भी महसूस हुई। यहां दिल्ली में कोई अपने जैसा दिख जाए, तो बड़ी खुशी होती है। लगता है कोई और अपना मिल गया। दूसरे वाक्य में तो उन्होंने खुद को हम सबका पड़ोसी साबित कर दिया। हममें से ज्यादातर लोगों की रिहाइश यमुना पार है। देवी भी शायद वहीं वास करती हैं। अब यह सवाल मत उठाइएगा कि देवी के आगे जी क्यों नहीं लगाया, यहां तो आम आदमी को भी सम्मान देने के लिए उसके नाम, पद या रिश्ते में जी लगाते हैं। फिर वह तो देवी ठहरीं। असल में, उन्हें ...जी, ...जी, ...जी, ....जी, ...जी, ...जी, ....जी जैसे संबोधन डाउन मार्केट यानी देसी लगते हैं। उन्होंने कहा भी,  मुझे जी लगाना मुझे बहुत खराब लगता है। इसका क्या मतलब है। तभी लगा कि देसी माटी वाली खुशबू फ्लेवर्ड है। तब तक यह भी समझ चुका था कि उन्हें देवी समझ कर गलती कर रहा हूं, वो तो डिवा हैं। क्या करूं, ऐसी गलती हो ही जाती है। हम हिंदी वाले हैं ही ऐसे।
अंग्रेज चले गए, औलाद छोड़ गए। बचपन में इस जुमले का मतलब समझ में नहीं आता था। धीरे-धीरे स्पष्ट हो गया कि इसका आशय अंग्रेजों के मानस पुत्र -पुत्रियों (एसीज) से है। इस देश में तमाम ऐसे लोग हैं, जिन्हें लगता है कि दुर्भाग्य से भारत में पैदा हो गए। बेचारे। अनफार्चुनेटली बार्न इन इंडिया। मैं इन जैसों को यूबीआइज कहता हूं। जो रहते हिंदुस्तान में हैं, खाते हिंदी की हैं, और गुणगान मैभा महतारी (सौतेली मां) का करते हैं। जबकि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में बोली, समझी जाती है हिंदी। मैं तो अपने पाकिस्तानी साथियों से हिंदी में ही बात करता हूं। देसी डिवा ने बहुत गर्व से कहा, मैं तो अंग्रेजी में लिखती हूं। उसका हिंदी में अनुवाद होता है, जिसे देखकर मुझे बड़ी हंसी आती है। लगता ही नहीं कि जो लिखा था, वह यही है। हंसी आनी भी चाहिए। हम हिंदी वाले हैं ही ऐसे। कोई हिंदी की रोटी खाता है, हिंदी को खरी खोटी सुनाता  है, यह कहने में गर्व अनुभव करता है कि मेरे दिमाग में विचार भी अंग्रेजी में ही आते हैं। और हम चुपचाप सुनते रहते हैं। उनके लिखे का अनुवाद करते रहते हैं। वो तो अच्छा है कि कुछ अंग्रेजीदां न केवल हिंदी बोलने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि समझने और लिखने की भी। उन जैसों से हिंदी को बहुत उम्मीद है।
आजादी मिले छह दशक से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन ज्यादातर हिंदुस्तानियों की मातृभाषा, फिलहाल राजभाषा का ही दर्जा हासिल कर पाई है। हिंदी दिवस पर एक बार फिर देशभर में आयोजनों की रस्म अदायगी होगी। संकल्प लिए जाएंगे। लेकिन हिंदी को राष्ट्रभाषा का सम्मान तभी मिल सकता है, जब हमपर हंसने वालों को करारा जबाव मिलेगा। जब हिंदी कुलीनों और संभ्रांतों की भाषा बने। जब हिंदी बोलने में लोग शर्म नहीं महसूस करें। जब यूबीआइज को खुद को एफबीआई (फार्चुनेटली बार्न इन इंडिया) बताने में गर्व करें। हिंदुस्तान में हिंदी को नीचा समझने वाले, नीचा दिखाने वाले जब तक अपनी गलती का अहसास नहीं करेंगे, हिंदी की दुर्दशा होती रहेगी। हम देखते रहेंगे। हम हिंदी वाले हैं ही ऐसे। अगर यही हाल रहा, हम मौनी बाबा बने रहे, चुपचाप अपनी हंसी उड़वाते रहे, तो बाल दिवस पर नेहरू जी (हम तो जी लगाएंगे ही) की तस्वीर पर माला पहनाने जैसा ही रिचुअल हमें हिंदी दिवस पर हिंदी के साथ करना पड़ेगा। संभव है, हिंदी को माला पहनाने का अवसर मेरे जीवनकाल में न आए, लेकिन मझे पूरा यकीन है कि आने वाली पीढ़ियां जरूर उस ऐतिहासिक क्षण की साक्षी बनेंगी।

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

कार और बेकार फिर चर्चा में


बात कुछ ऐसी है कि सत्तर के दशक में लौटते हैं। आम चुनाव सिर पर थे, मुकाबले में थीं इंदिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी और अटल, आडवानी और बलराज मधोक का भारतीय जनसंघ। चुनाव में कांग्रेस ने नारा उछाला-जनसंघ की क्या पहचान, बगल में छुरी मुंह में राम। पर इसके जवाब में आए नारे बेटा कार बनाता है, मां बेकार बनाती है ने कांग्रेस को बैकफुट पर ला दिया। दरअसल उस समय बेरोजगारी बड़ा मुद्दा बनकर उभरा था जबकि युवराज संजय गांधी मारूति कार बनाने की ठाने बैठे थे। नतीजे आए तो पता लगा कि मां-बेटे को यह नारा बहुत भारी पड़ा।
कार अब एक बार फिर चर्चा में है। देश के सबसे बड़े सूबे यूपी में भत्ता पा रहे हैं बेकार और माननीयों को मिल रही कार। यह अलग बात है कि इस बार बेकार और कार दोनों का ताल्लुक युवराज से है, मां राजनीति में कभी थीं नहीं और पिताश्री का इससे लेना देना नहीं।
धरतीपुत्र मुलायम सिंह यादव के पुत्र माननीय अखिलेश यादव को इस साल हुए यूपी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मीडिया और सपा कार्यकर्ताओं ने युवराज की पदवी से नवाजा। उन्हें कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी के मुकाबिल खड़ा किया गया। अखिलेश के लिए तो यह बहुत बड़ी बात थी, अलबत्ता कांग्रेसी युवराज यूपी तक ही सिमट कर रह गए। सारी ताकत झोंकने के बाद भी नतीजे उनके पक्ष में नहीं आए। जबकि उनके कद के हिसाब से यह बहुत छोटा चुनाव था। बड़बोलों की बोलती तो बंद हुई ही, युवराज को भी तब से ज्यादा बोलते नहीं देखा-सुना गया। जीत का सेहरा सपाई युवराज अखिलेश के सिर बंधा। वह महाराज बन गए। फिर चुनाव पूर्व किए गए अपने सभी वायदों पर उन्होंने अमल भी किया। उस वायदे पर भी, जिसमें कहा गया था कि सपा की सरकार बनी तो सूबे के बेकारों को बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा। भत्ता पाकर बेरोजगार निहाल हो गए। उन्होंने अब नौकरी भी तलाशना छोड़ दिया है। वैसे भी उन्हें जरूरत क्या है नौकरी की। जब घर बैठे ही पेंशन मिल रही हो, तो पसीना बहाने से क्या फायदा।
बेकारों के बाद युवराज से महाराज बने अखिलेश को ख्याल आया माननीयों का, सो उन पर मेहरबान हो गए। उन्होंने विधानसभा में ऐलान कर दिया कि सूबा भले ही वित्तीय संकट से जूझ रहा हो, पर जिन माननीयों के पास चार पहिया वाहन नहीं हैं, वे अपने लोकल एरिया डेवलपमेंट फंड से 20 लाख रुपये तक की कार खरीद सकते हैं। अब अगर, सीएम की घोषणा का लाभ उठाते हुए सभी माननीयों ने सचमुच अपने लिए कार खरीद लिया, तो सूबे के सरकारी खजाने को करीब 80 करोड़ रुपए का चूना लगेगा। कानून की बात करें तो उसके मुताबिक लोकल एरिया डेवलपमेंट फंड का इस्तेमाल सिर्फ इलाके के विकास के मद में ही किया जा सकता है। व्यक्तिगत लाभ के लिए तो उसका इस्तेमाल कतई नहीं होना चाहिए। पर राजा तो आखिर राजा ही होता है। हमने जिस देश के कानून की नकल की है, उसमें साफ-साफ लिखा है- किंग कैन डू नो रांग। यानी राजा तो गलती कर ही नहीं सकता है। ईश्वर आपकी प्रगति का मार्ग प्रशस्त करे राजा साहब।


सोमवार, 28 मई 2012

हाथ जले पर साइकिल चले

हाथ जले पर साइकिल चले
ओमकारा फिल्म का वह गाना याद होगा, बीड़ी जलइले... जिगर मे बड़ी आग है। बिपाशा बसु के जिगर की आग से बीड़ी जली या नहीं लेकिन पेट्रोल की कीमतों में लगी आग न केवल हाथ को झुलसा रही है, बल्कि लोगों के घर भी जला रही है। पर कहावत है कि किस्मत के खेल निराले। अब देखिए न। वही आग समाजवादी पार्टी के लिए बड़े काम की साबित हो रही है। बिना कुछ किए, किसी के चाहे-अनचाहे, उसकी रोटी सिक रही है। पेट्रोल की कीमतों की आग में समाजवादी पार्टी की साइकिल दमक रही है। हर छोटा-बड़ा आदमी साइकिल पर चलने की बात कर रहा है। और इस बार तो हद ही हो गई। पेट्रोल की कीमतों में अब तक की सबसे बड़ी बढ़ोतरी देखने के बाद जिगर में आग होने का दम भरने वाली बिपाशा बसु तक ने साइकिल से चलने का ऐलान कर दिया। कई और सिने तारिकाएं भी कुछ इसी तरह की बात कह रही हैं। 
कांग्रेस नीत यूपीए-2 सरकार के अब तक के तीन साल के कार्यकाल में पेट्रोल की कीमतें 16 बार बढ़ीं। 44 रुपये से कीमतें 75 के करीब पहुंच गईं। यह अपने आप में रिकार्ड है। पर जैसे-जैसे कीमतों में इजाफा होता गया, साइकिल की अहमियत बढ़ती गई। आकड़ों पर गौर करेंगे तो आप भी समझ जाएंगे। जरा तीन साल पहले की समाजवादी पार्टी और उसकी साइकिल की हालत पर गौर कीजिए। समाजवादी पार्टी के मुखिया, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री माननीय मुलायम सिंह यादव जी फिरोजाबाद संसदीय सीट से अपनी बहू डिंपल यादव तक को नहीं जितवा पाए थे, जबकि वह सीट वहां से सांसद और उनके बेटे अखिलेश यादव के इस्तीफा देने के बाद खाली हुई थी।
हम तो इसे पेट्रोल की कीमतों में उछाल का ही असर कहेंगे कि समाजवादी पार्टी ने अकेले अपने दम पर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई. सूबे को अखिलेश यादव जैसा युवा मुख्यमंत्री मिला। जबकि तीन साल की कौन कहे, छह महीने पहले भी कोई बहुत भरोसे से यह नहीं कह पा रहा था कि समाजवादी पार्टी बहन मायावाती की बहुजन समाज पार्टी को इस तरह चित करेगी. लेकिन पेट्रोल की बढ़ती कीमतें समाजवादी पार्टी के लिए धोबिया पाट दांव साबित हुईं। यह भी पेट्रोल की बढ़ती कीमतों का ही असर है कि कन्नौज सीट पर समाजवादी पार्टी की तरफ से डिंपल यादव के चुनाव लड़ने के ऐलान के साथ ही उनकी जीत के दावे शुरू हो गए हैं। इसे भी संयोग कहेंगे कि यह सीट भी उनके पति और सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के इस्तीफा देने के बाद ही रिक्त हुई है।
पिछले दिनों यूपीए के तीन साल पूरे होने के मौके पर जब प्रधानमंत्री ने रात्रिभोज का आयोजन किया तो उसमें मुलायम सिंह यादव को खास तवज्जो दी गई। वहां सोनिया गांधी ने जिस तरह से मुलायम सिंह यादव की मेहमाननवाजी की, उसके बाद से कयास लगाए जा रहे हैं कि संकट के दौर में मुलायम सिंह सरकार के सबसे बड़े संकटमोचक साबित हो सकते हैं। खबरें तो कुछ इसी तरह की आ रही हैं कि पिछले तीन सालों में ममता दीदी के तेवरों से यूपीए-2 सरकार तंग आ चुकी है। उनका रोज रोज लाल पीला होना, सड़क पर उतरना सत्तारूढ़ पार्टी को किसी भी कोने से सुहा नहीं रहा। कहा जाने लगा है कि सरकार और सरकार चलाने वाले उनसे पिंड छुड़ाना चाहते हैं। उन्हें यह मंजूर नहीं कि यूपीए का ही कोई घटक दल सरकार के फैसलों पर उंगली उठाए। और अगर वे ऐसा सोच पा रहे हैं, तो उसकी एकमात्र वजह समाजवादी पार्टी का दोस्ताना व्यवहार है। यानी साइकिल की अहमियत बढ़ रही है।
समाजवादी पार्टी को भी लगता है कि यूपीए-2 सरकार का कार्यकाल पूरा होने में अभी दो साल का समय है। इस दौरान अभी न जाने कितनी बार पेट्रोल की कीमतों में आग लगे। उसकी साइकिल की अहमियत तो बढ़ती ही जाएगी। यही सोचकर या यह कहें कि सरकार के बचे हुए दो साल का समाजवादी पार्टी पूरा फायदा उठाना चाहती है। उसने अपने पांव पसारने शुरू भी कर दिए हैं। विभिन्न राज्यों में दमदार मौजूदगी के लिए पार्टी कोई कोर कसर बाकी नहीं लगाना चाहती। उसे हर हाल में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा चाहिए. और इसके लिए उसकी सारी उम्मीदें पेट्रोल की कीमतों पर टिकी हुई हैं। अब कांग्रेस का हाथ जलता है तो जले, समाजवादी पार्टी की साइकिल तो चलेगी और खूब चलेगी। पेट्रोल की कृपा से मुलायम सिंह जी देश के अगले प्रधानमंत्री बन जाएं तो किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। पेट्रोल की आग भले ही मुझे भी जला रही हो, पर हम तो यही दुआ करेंगे कि मुलायम सिंह जी देश के प्रधानमंत्री बनें. वैसे भी सूबा उत्तर प्रदेश बहुत दिनों से अपने किसी नेता के इस पद तक पहुंचने का इंतजार कर रहा है।                     


मंगलवार, 20 सितंबर 2011

मोदी करे तो साला कैरेक्टर ढीला है.

सद्भावना मिशन के नाम पर तीन दिनों तक चले उपवास ने, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी या फिर भाजपा (जिस पार्टी से मोदी ताल्लुक रखते हैं) की सेहत पर कितना असर डाला यह तो बाद में पता लगेगा, पर इसमें कोई विवाद नहीं कि इसने, देश की सभी पार्टियों और उनके प्रमुख नेताओं को किसी न किसी तरह प्रभावित जरूर किया.
मोदी ने अपने उपवास को सद्भावना मिशन नाम दिया, पर ऐसे लोगों की तादाद कम नहीं है जिनके लिए वह नौटंकी, तमाशा या राजनीतिक शोशेबाजी से अधिक, कुछ नहीं था. कहा जा रहा है कि हाई प्रोफाइल उपवास के बहाने मोदी ने अपने पाप धोने की कोशिश की. 2002 में हुए गुजरात दंगों में उनकी भूमिका को देश का बुद्धिजीवी और प्रगतिशील तबका इसी नाम से पुकारता है. पर मेरे हिसाब से उपवास के बहाने, मोदी ने शुद्ध रूप से राजनीति की- उपवास की राजनीति. मोदी राजनेता हैं. उस लिहाज से राजनीति उनका धर्म-कर्म है, और होना भी चाहिए. इसमें बुराई कहां है? राजनेता अगर राजनीति नहीं करेगा तो और क्या सब्जी बेचेगा?
राजनीति में सब कुछ जायज माना जाता है. फिर चाहे वह परदे के पीछे हो या सरेआम. मोदी ने उपवास की राजनीति की. बाकायदा डुगडुगी पिटवाई, देश भर के अखबारों में विज्ञापन दिया और उस बहाने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचने में कामयाब रहे. कम से कम इसमें किसी को ऐतराज नहीं होगा कि लगातार तीन दिनों तक देश भर की मीडिया में वह छाए रहे. इसने साबित कर दिया कि आप मोदी को पसंद कर सकते हैं, उनसे नफरत कर सकते हैं, लेकिन उनकी अनदेखी नहीं कर सकते.
एक बात समझ में नहीं आई कि उपवास मोदी करने जा रहे थे, लेकिन दूसरों के पेट में ऐंठन क्यों हो रही थी? सबसे पहले मोदी के राजनीतिक गुरु से विरोधी बने शंकर सिंह बाघेला की बात करते हैं. मोदी के उपवास का ऐलान उन्हें हजम नहीं हुआ. सो उन्होंने उपवास का जवाब उपवास से ही देने का फैसला किया. यह तो अच्छा हुआ कि मोदी ने कोई और अनुष्ठान नहीं लिया था, वरना बाघेला साहब के लिए मुश्किल हो जाती. बहरहाल अपने उपवास की कामयाबी के लिए उन्होंने तंबू-कनात लगवाया, दंगा पीडि़तों की भीड़ जुटाई, हरेन पांड्या के परिजनों को बुलाया. इसके अलावा, और भी जो कुछ कर सकते थे, किया. क्या बाघेला साहब इस बात से इंकार कर सकते हैं कि यह सब राजनीति नहीं थी.
हालांकि बाघेला साहब को अब तक हिंदी की यह कहावत समझ में आ जानी चाहिए थी कि गुरु गुड़ ही रह गए, चेला शक्कर हो गया. सीधा-सा मतलब है कि उन्हीं से राजनीति का ककहरा सीखने वाला उनका शिष्य अब बहुत आगे निकल चुका है. अब उससे होड़ करने का कोई मतलब नहीं. मोदी को जहां देश भर में जाना-पहचाना जाता है, वहीं गुरुजी के सामने अपने गृह प्रदेश के बाहर पहचान के संकट से जूझने का खतरा है. गुजरात के बाहर और राजनीति में रुचि रखने वालों के अलावा कम ही लोग उन्हें जानते-पहचानते हैं. अगर मेरी बात पर यकीन नहीं तो खुद ही पता कर लीजिए.
मोदी के अनशन से सामाजिक कार्यकर्ता और मशहूर नृत्यांगना मल्लिका साराभाई का भी हाजमा खराब हो गया. मल्लिका जी, आप बेकार ही राजनीति में पांव पसार रही हैं. मैं तो कहूंगा, अभी भी मौका है, ज्यादा देर नहीं हुई है. उसी काम में मन लगाइए, जिसने आपको इतनी शोहरत दिलवाई. कम से कम उसमें कीचड़ लगने का तो खतरा नहीं है. वैसे आपका रिपोर्ट कार्ड यही बताता है कि राजनीतिक ता ता-थैया के लिए अभी और रियाज की जरूरत है. बहरहाल, अपने वकीलों को घूस देने का जो जुमला आपने उछाला है, वह पहली नजर में काफी बचकाना लगता है. अलबत्ता, इस बात के लिए आपको धन्यवाद दिया जाना चाहिए कि आपने अपने तई पूरी राजनीति करने की कोशिश की. अच्छा है, अनुभव काम आएगा.
अब जरा पार्टियों की बात करते हैं. तथाकथित सेकुलर पार्टियां तो भाजपा को सांप्रदायिक कहती ही हैं, देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी कांग्रेस भी इस मामले में पीछे नहीं रहना-दिखना चाहती. और बात जब भाजपा के सबसे सांप्रदायिक चेहरे यानी नरेंद्र मोदी की हो तो फिर भला कौन चुप रहता है. कांग्रेस को गुजरात दंगों के दर्द का तो अहसास है, लेकिन 1984 के सिख दंगों का भूत अब उसे परेशान नहीं करता. उसे उसने भूत यानी पास्ट मान लिया है. उसे गुजरात दंगों में मोदी की भूमिका तो नजर आती है, लेकिन सिख दंगों के लिए वह किसी कांग्रेसी नेता को जिम्मेदार मानने को तैयार नहीं. अब यह राजनीति नहीं तो और क्या है?
अब जरा गैर कांग्रेसी पार्टियों की बात करें. अन्नाद्रमुक सुप्रीमो जयललिता के अलावा, शिवसेना और शिरोमणि अकाली दल जैसे राजग के कई सहयोगी दल जहां मोदी के साथ कंधे से कंधा मिलाए खड़े दिखे, वहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जदयू के स्वनामधन्य नेता शरद यादव इस पूरे प्रकरण से किनारा किए हुए थे. उन्हें अपने वोट बैंक की चिंता सताए जा रही थी. लेकिन मोदी की उपवास की राजनीति का यही तकाजा था और सबने अपने अपने हिसाब से राजनीति की भी. फिर ऐसा क्यों कि कांग्रेस करे तो ठीक, नीतीश करें तो ठीक, बाघेला करें तो ठीक, मल्लिका करें तो ठीक, पर मोदी करे तो साला कैरेक्टर ढीला है.
(ब्‍लॉग में व्‍य‍क्‍त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, इनका द संडे इंडियन की संपादकीय नीति से कोई लेना-देना नहीं है)